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वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई धुरी बनता भारत

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ब्लिट्ज ब्यूरो

भारत अब केवल एक बड़ा बाजार नहीं बल्कि वैश्विक समाधान प्रस्तुत करने वाला देश बनता जा रहा है। यही भारत की नई पहचान है और यही इस दौर की सबसे बड़ी कहानी।

21वीं सदी के तीसरे दशक के मध्य में भारत ने वैश्विक भू-राजनीति और अर्थशास्त्र के संगम पर स्वयं को एक अपरिहार्य शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘विकसित भारत 2026’ का खाका अब केवल प्रशासनिक फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जमीनी हकीकत बन चुका है जिसकी गूंज वाशिंगटन के गलियारों से लेकर ब्रुसेल्स के व्यापारिक केंद्रों तक सुनाई दे रही है। टैरिफ के तूफान में भारत की स्थिरता की बात करें तो वर्ष 2025 के उत्तरार्ध में जब अमेरिका ने विदेशी वस्तुओं पर 50% तक का आक्रामक टैरिफ लगाने की नीति अपनाई, तब वैश्विक विशेषज्ञों ने भारतीय निर्यात में भारी गिरावट की आशंका जताई थी। हालांकि, नवीनतम व्यापारिक आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। वर्ष 2025 के दौरान अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में 11% की अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है।
यह वृद्धि केवल संयोग नहीं, बल्कि भारत की ‘अडैप्टेबिलिटी’ (अनुकूलन क्षमता) का प्रमाण है। भारत वर्तमान में अमेरिका के साथ एक ऐतिहासिक ‘चरणबद्ध व्यापार सौदे’ के अंतिम चरण में है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा शुद्ध रूप से ‘फ्रेंड-शोरिंग’ का उदाहरण है, जो वैश्विक सप्लाई चेन से चीन के एकाधिकार को कम करने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होगा। इसमें न केवल रणनीतिक क्षेत्रों में टैरिफ कम करने पर सहमति बनी है बल्कि डिजिटल सेवाओं और डेटा सुरक्षा पर भारत की शर्तों को भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली है।
इस दौरान भारत के औद्योगिक परिदृश्य में सबसे बड़ी संरचनात्मक तब्दीली ‘चार श्रम संहिताओं’ (लेबर कोड्स) का पूर्ण कार्यान्वयन है। दशकों पुराने 29 जटिल कानूनों को चार सरल संहिताओं में समाहित कर सरकार ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। इन सुधारों के तहत, सार्वभौमिक न्यूनतम वेतन और गीग वर्कर्स (जोमैटो, स्विगी आदि) को पहली बार भविष्य निधि (ईपीएफओ) के दायरे में लाना एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। साथ ही, फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी की पात्रता को पांच साल से घटाकर एक साल करना श्रम शक्ति के सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर है। कार्य के घंटों में लचीलापन (8 से 12 घंटे का विकल्प) अब एप्पल और सेमीकंडक्टर निर्माण जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनियों को भारत में अपनी इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
इसके अतिरिक्त सशक्तिकरण के प्रधानमंत्री ‘मोदी के मॉडल’ के तहत मुफ्तखोरी पर विकास की जीत है। राजनीतिक मोर्चे पर, मोदी 3.0 ने ‘मुफ्त की राजनीति’ (फ्रीबीज) के प्रचलित मॉडल को नकारते हुए ‘संतृप्ति मॉडल’ (सेचुरेशन मॉडल) को प्राथमिकता दी है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 11 वर्षों में 27 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी की रेखा से ऊपर आए हैं। ‘लखपति दीदी’ योजना के माध्यम से 3 करोड़ ग्रामीण महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण न केवल सामाजिक परिवर्तन है बल्कि यह ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति (परचेसिंग पॉवर) को भी गति दे रहा है। हालिया चुनावों में जनता द्वारा बुनियादी ढांचे और भविष्य की सुरक्षा के पक्ष में दिया गया जनादेश इसी विकासवादी राजनीति की पुष्टि करता है किंतु इन सबके बीच चुनौतियां भी कम नहीं हैं और भविष्य की राह भी आसान नहीं होने वाली। ब्लिट्ज़ इंडिया का विश्लेषण कुछ गंभीर चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है। 1 जनवरी 2026 से प्रभावी हुआ यूरोपीय संघ का ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (सीबीएएम) भारतीय स्टील और एल्युमीनियम निर्यातकों के लिए एक नई बाधा पेश कर सकता है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक टैरिफ युद्ध के बीच एमएसएमई क्षेत्र को अपना मार्जिन बचाए रखने के लिए अधिक सरकारी समर्थन की आवश्यकता होगी। साल 2026 का भारत एक ऐसे ‘हाइब्रिड मॉडल’ का प्रतिनिधित्व कर रहा है जहां वह अपनी शर्तों पर व्यापार करने की शक्ति रखता है और साथ ही अपने नागरिकों को एक आधुनिक सुरक्षा कवच भी प्रदान करता है।
भारत और अमेरिका के बीच चल रहा चरणबद्ध व्यापार समझौता इसी रणनीति का हिस्सा है जो भरोसेमंद साझेदारों के बीच सप्लाई चेन को मजबूत करने और एकाधिकार पर निर्भरता कम करने की दिशा में अहम भूमिका निभा रहा है। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में भारत ने डिजिटल सेवाओं और डेटा सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अपनी शर्तें मजबूती से रखीं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार भी किया गया है और डिजिटल क्षेत्र में भारत की विशिष्ट उपलब्धियां उसका डंका भी बजा रही हैं।
भारत की व्यावहारिक व्यापार नीति और तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की क्षमता भी उसके सशक्त होने का प्रमाण है। 2026 का भारत एक ऐसे विकास मॉडल का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें आर्थिक आत्मविश्वास और सामाजिक सुरक्षा साथ-साथ चलते हैं। भारत अब केवल एक बड़ा बाजार नहीं बल्कि वैश्विक समाधान प्रस्तुत करने वाला देश बनता जा रहा है। यही भारत की नई पहचान है और यही इस दौर की सबसे बड़ी कहानी।

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