ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही 10 महीने तक भारत को टैरिफ और सीजफायर के जुमलों में उलझाए रखा, लेकिन जब ट्रेड डील का एलान हुआ तो सबसे ज्यादा हक्क ा-बक्क ा चीन रह गया। भारत-अमेरिका ट्रेड डील ने एक ही झटके में उसके साथ कारोबार करने में चीन को बुरी तरह से पछाड़ने का रास्ता तैयार कर दिया है। अगर ट्रेड डील की बारीकियों पर गौर करें तो यह टैरिफ को सिर्फ 50% से 18% करने तक ही सीमित नहीं है। इसके प्रावधान ऐसे हैं कि चीन के लिए पहले से ही मुश्किल चुनौतियां अब और दोगुनी हो गई हैं। अबतक भारत के सामने अथाह मुश्किलें नजर आ रही थीं और चीन ज्यादा टैरिफ के बावजूद अमेरिका के साथ व्यापार में भारत के मुकाबले काफी बेहतर स्थिति में था। लेकिन, अब चीजें पूरी तरह से भारत के पक्ष में शिफ्ट हो चुकी हैं।
अमेरिका की ओर से फेंटानिल टैरिफ को 10% तक कम करने के बावजूद चीन के 99% निर्यात पर अमेरिका ने 37.5% या 55% टैरिफ लगा रखा है। सच तो यह है कि 70% से ज्यादा चीजें 55% टैरिफ के दायरे में हैं। इलेक्टि्रकल व्हीकल पर तो यह करीब 130% है। ट्रेड डील के एलान के बाद टैरिफ 18% होने के साथ ही परिस्थितियों ने पूरी तरह से करवट ले ली है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील मात्र 18% टैरिफ तक ही सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस डील में भारत को कई और छूटें मिली हैं। इससे भारत को बहुत जबरदस्त फायदा होने वाला है। कुल मिलाकार ट्रेड डील के बाद चीन के मुकाबले अब भारत 50% फायदे में रहने जा रहा है।
एमएसएमई सेक्टर निकाल देगा चीन का तेल
भारत के नजरिए से फायदे की बात कर रहे हैं तो यह देखना भी जरूरी है कि हम अगर अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस में रहे हैं तो उनमें से सबसे बड़ा योगदान सभी सेक्टर के छोटे और मंझोले उद्यमों (एमएसएमई) का रहा है। भारत अपने कुल निर्यात का जो लगभग 20% अमेरिका भेजता है, उनमें से लगभग 60% माल एमएसएमई सेक्टर से ही जाता है। यह ऐसा सेक्टर है, जिसपर चीन ने लगभग दुनिया में एकाधिकार बना रखा है। अब उसके हाथ से यह सेक्टर भी निकलने का खतरा मंडराने लगा है।
रेयर अर्थ मैग्नेट पर पहले ही लगा चीन को झटका
ट्रेड डील से पहले अमेरिका भारत को अपने क्रिटिकल मिनरल्स मुहिम का भी हिस्सा बना चुका है। इसको लेकर इसी हफ्ते वॉशिंगटन में 50 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक भी होने वाली है। कूटनीतिक तौर पर इस मुहिम ने चीन को पहले से ही टेंशन में डाल रखा है, जिसने लगभग साल भर से इसकी सप्लाई चेन को अपनी मर्जी के मुताबिक पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। भारत के लिए परमानेंट मैग्नेट के लिए विकल्प तैयार करना रणनीतिक प्राथमिकता बन चुकी है, जिसके पास अभी मात्र 3% रेयर अर्थ मैग्नेट का बाजार है।

