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सजा तय करना दोषी का अधिकार नहीं

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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। अपनी पत्नी की हत्या के लिए 30 साल से जेल में बंद व्यक्ति द्वारा जीवन पर्यन्त आजीवन कारावास को मृत्युदंड से कहीं अधिक बदतर बताने पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आप चाहते हैं कि आपकी सजा को फांसी में बदल दिया जाए। अदालत ने कहा कि सजा तय करना दोषी का अधिकार नहीं। स्वामी श्रद्धानंद उर्फ मुरली मनोहर मिश्रा (84) ने रिहाई का अनुरोध करते हुए कहा कि वह बिना किसी पैरोल या छूट के ‘लगातार कारावास’ में है और जेल में रहने के दौरान उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल मामला दर्ज नहीं किया गया है। सर्वोच्च अदालत ने जेल से रिहाई के अनुरोध वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया।

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