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जेल में रहकर इलाज का अधिकार, अंतरिम जमानत जरूरी नहीं : कोर्ट

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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल के एक फैसले में कहा कि स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार का अभिन्न अंग है। यह अधिकार कैदियों और हिरासत में बंद आरोपियों तक भी लागू होता है, भले ही वे गंभीर अपराध जैसे हत्या के आरोपी हों।
जगरनाथ शाह उर्फ लाला बनाम दिल्ली राज्य मामले में कोर्ट ने आरोपी को अंतरिम जमानत पर रिहा करने के बजाय जेल में रहते हुए आवश्यक न्यूरोलॉजिकल जांच (सीटी स्कैन और एमआरआई) कराने की अनुमति दी।
आरोपी ने न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के कारण सफदरजंग अस्पताल में 22 जनवरी को सीटी स्कैन और 11 मई को एमआरआई जांच कराने की आवश्यकता बताई थी।
उन्होंने चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत की मांग की थी। सुनवाई के दौरान राज्य पक्ष ने बताया कि सत्र न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2025 को आरोपी की अंतरिम चिकित्सा जमानत बढ़ाने से इनकार कर दिया था, जिसे हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में छिपाया गया था। आरोपी के वकील ने जमानत याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। न्यायमूर्ति विकास महाजन की एकल पीठ ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए निर्देश दिया कि एम्स में आरोपी की जांच को प्राथमिकता दी जाए। एक हफ्ते में जांच पूरी की जाए।
हिरासत में भी उचित चिकित्सा सुविधा जरूरी
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिरासत में बंद व्यक्ति को उचित चिकित्सा सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता। साथ ही कहा, राज्य और शिकायतकर्ता के हितों का भी संतुलन बनाए रखना आवश्यक है कोर्ट ने कहा ऐसे मामलों में न्यायालय को हितों का संतुलन करना पड़ता है ताकि बंद व्यक्ति को उचित चिकित्सा उपचार से वचित न किया जाए और राज्य व शिकायतकर्ता को भी कोई नुकसान न हो।

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