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ठेकेदारों से कहें, हर 50 किमी के बाद गौशाला बनाएं : सुप्रीम कोर्ट

Cow urine not good for human consumption
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को कहा कि वह सड़क निर्माण में शामिल ठेकेदारों से राजमार्गों पर आने वाले आवारा पशुओं की देखभाल के लिए कंपनियों के सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत गौशाला बनाने पर विचार करने को कहे। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आवारा कुत्तों के स्थानांतरण और बधियाकरण संबंधी शीर्ष न्यायालय के सात नवंबर के आदेश में संशोधन का अनुरोध करने वाली कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायायल ने हालांकि पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु द्वारा उसके निर्देशों के अनुपालन को लेकर असंतोष व्यक्त किया।
न्यायालय ने कहा कि पंजाब सरकार द्वारा प्रतिदिन 100 आवारा कुत्तों का बधियाकरण करने के प्रयास अपर्याप्त हैं और यह ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है। पीठ ने एनएचएआई की ओर से पेश अधिवक्ता से एक एप विकसित करने को भी कहा, जहां लोग राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा जानवरों को देखे जाने की सूचना दे सकें। न्यायालय ने अधिवक्ता से कहा, आप ठेकेदारों से यह भी कह सकते हैं कि वे लगभग 50 किलोमीटर के बाद एक गौशाला स्थापित करें जहां कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत इन आवारा जानवरों की देखभाल की जा सके। अधिवक्ता ने एप विकसित करने और ठेकेदारों से गौशालाएं स्थापित करने के लिए कहने की संभावना पर विचार करने पर सहमति व्यक्त की। एनएचएआई के अधिवक्ता ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर 1300 से अधिक संवेदनशील स्थान हैं और प्राधिकरण सड़क दुर्घटनाओं से बचने के लिए इनसे निपट रहा है। उन्होंने कहा कि अधिकांश राज्यों ने राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन महाराष्ट्र, झारखंड, राजस्थान जैसे कुछ राज्य अब भी इस समस्या के समाधान के लिए आगे नहीं आए हैं। राजस्थान की ओर से पेश हुई अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने न्यायालय के पूर्व निर्देशों के अनुपालन के बारे में पीठ को बताया कि राज्य में बधियाकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं और शैक्षणिक संस्थानों के क्षेत्रों की बाड़बंदी की गई है। पीठ ने इसपर रेखांकित किया कि राज्य सरकार के हलफनामे के अनुसार आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए केवल 45 वैन हैं और यह अपर्याप्त है। न्यायमूर्ति मेहता ने सवाल किया, केवल जयपुर के लिए ही लगभग 20 वैन की आवश्यकता होगी। आपको सुविधाओं को बढ़ाना होगा और विभिन्न शहरों के लिए वाहनों की संख्या में वृद्धि करनी होगी। यह दलील दी गई है कि पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों के तहत सीएसवीआर (पकड़ना, बधियाकरण करना, टीकाकरण करना और छोड़ना) फार्मूला लागू किया जाना चाहिए। अधिक वाहन और जनशक्ति के बिना आप इस कार्य को कैसे करेंगे? भाटी ने कहा, हमने इस मुद्दे से निपटने के लिए अधिक बजटीय आवंटन की मांग की है।
पीठ ने कहा, अगर आप आज इस समस्या का समाधान नहीं करेंगे तो यह बढ़ती ही जाएगी। हर साल आवारा कुत्तों की संख्या में 10-15 प्रतिशत तक वृद्धि होगी। इसे नजरअंदाज करके आप अपनी ही समस्या बढ़ा रहे हैं।
जैसा कि पंजाब ने कहा, वे प्रतिदिन 100 कुत्तों का बधियाकरण कर रहे हैं। इसका कोई फायदा नहीं है। यह ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है। भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) की ओर से पेश अधिवक्ता ने पीठ को सूचित किया कि पिछले साल सात नवंबर को शीर्ष अदालत के आदेश के बाद से गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) और निजी पक्षों से बधियाकरण केंद्र और पशु आश्रय खोलने के लिए आवेदनों की संख्या में वृद्धि हुई है।
उन्होंने कहा, कुछ आवेदन लंबित हैं। सात नवंबर के आदेश के बाद 250 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं, उन्हें अभी तक हमारी ओर से मान्यता नहीं दी गई है।

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