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कानून न बदलाव का विरोध करे, न ही बिना सोचे-समझे नवीनता को अपनाए’

Surya Kant
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा है कि न्याय एक जीवंत संस्था है, जिसे निरंतरता और परिवर्तन के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। कानून को न तो परिवर्तन का विरोध करना चाहिए और न ही बिना सोचे-समझे नवीनता को अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो कानून परिवर्तन के अनुरूप नहीं ढलता है, वह शुद्ध नहीं रह जाता। वहीं जो कानून बिना सोचे-समझे हर नवीनता को अपना लेता है, उसके अपना नैतिक केंद्र खोने का जोखिम रहता है। पणजी में 2 दिवसीय एससीएओआरए अंतरराष्ट्रीय विधि सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘प्रत्येक कानूनी प्रणाली सदियों के संघर्ष, वाद-विवाद, समझौते और नैतिक साहस से प्राप्त विरासत है।’
सीजेआई ने जोर देकर कहा कि सवाल हमेशा बना रहेगा कि एक ऐसी दुनिया में न्याय खुद के प्रति वफादार कैसे रह सकता है, जो स्थिर रहने से इनकार करती है। उन्होंने कहा, ‘यह साझा जिज्ञासा ही मुझे जीवंत संस्था के रूप में न्याय के विषय की ओर ले जाती है, जो समय और परिवर्तन की कसौटी पर खरी उतरती है। इसकी सेवा करने वालों के सामूहिक अनुशासन द्वारा कायम रहती है।’
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हर कानूनी व्यवस्था एक विरासत है और आज यहां एकत्रित हममें से किसी ने भी उन अदालतों का निर्माण नहीं किया है, जिनमें हम काम करते हैं, न ही उस प्रक्रिया का जिस पर हम भरोसा करते हैं और न ही उन सिद्धांतों का जिनका हम इतनी सहजता से उल्लेख करते हैं। हम सभी ने इन्हें सदियों के संघर्ष, बहस, समझौते और नैतिक साहस से प्राप्त किया है। यह विरासत विशेषाधिकार प्रदान करती है, लेकिन साथ ही संयम और जिम्मेदारियां भी थोपती है।’ उन्होंने कहा कि यह हम सभी को याद दिलाता है कि हम न्याय संस्था के स्वामी नहीं हैं, बल्कि केवल अस्थायी संरक्षक हैं।
न्याय व्यवस्था पर पड़ रहे दबाव
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि आज न्याय व्यवस्था पर पड़ रहे विभिन्न दबाव न तो काल्पनिक हैं और न ही अतिरंजित। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वे न्यायपालिका की स्वायत्तता या स्वतंत्रता पर किसी भी तरह के दबाव की बात नहीं कर रहे हैं, जैसा कि लोग कभी-कभी गलत समझते हैं।

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