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‘पीड़िता की चुप्पी को आरोपी के पक्ष में नहीं माना जा सकता’

'The victim's silence cannot be considered in favour of the accused'
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 39 साल पुराने रेप मामले में आरोपी की सजा बरकरार रखते हुए पीड़िता और उसके परिवार के प्रति सहानुभूति जताई है। अदालत ने कहा कि यह बेहद दुखद है कि एक नाबालिग लड़की और उसके परिवार को चार दशकों तक इस भयावह घटना का न्याय पाने के लिए इंतजार करना पड़ा। जस्टिस विक्रम नाथ और संजय करोल की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के 2013 के फैसले को खारिज कर दिया जिसमें आरोपी को बरी कर दिया गया था।
मामला 1986 का
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह पूरा मामला 1986 का है, जब 21 वर्षीय युवक ने एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म किया था। इसके बाद नवंबर 1987 में निचली अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी। हालांकि कानूनी प्रक्रिया के तहत मामला आगे बढ़ता गया और अंततः राजस्थान हाईकोर्ट में आरोपी को गवाहों के कमजोर बयान के आधार पर बरी कर दिया गया।
चुप रही और आंसू बहाए
हाईकोर्ट ने कहा था कि पीड़िता ने अदालत में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा और जब उससे घटना के बारे में पूछा गया तो वह चुप रही और सिर्फ आंसू बहाए। इस आधार पर आरोपी को राहत दी गई थी।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता की चुप्पी को आरोपी के पक्ष में नहीं गिना जा सकता क्योंकि यह उसके मानसिक आघात का परिणाम था।
बच्चे की चुप्पी की तुलना
अदालत ने कहा कि किसी बच्चे की चुप्पी को वयस्क पीड़ित की चुप्पी के बराबर नहीं समझा जा सकता। बच्चों पर हुए यौन अपराधों के मामलों में उनके व्यवहार और मानसिक स्थिति को अलग दृष्टिकोण से देखने की जरूरत होती है। इस मामले में पीड़िता का केवल रोना ही यह दिखाने के लिए पर्याप्त था कि वह मानसिक रूप से किस कदर आहत थी।
अहम कदम
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न्याय की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों में पीड़िता की चुप्पी का मतलब आरोपी को निर्दोष मान लेना नहीं होता। यह फैसला ऐसे मामलों में एक मिसाल कायम करेगा जहां मानसिक आघात के कारण पीड़ित बच्चे खुलकर बयान नहीं दे पाते।

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