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यूपी का यह स्टार्टअप इसरो के साथ बना रहा रीयूजेबल रॉकेट

This UP startup is making reusable rocket with ISRO
ब्लिट्ज ब्यूरो

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का स्टार्टअप देश को एक अलग स्थान दिलाने की कोशिश में जुटा है। स्टार्टअप एब्योम टेक्नोलॉजी, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो के साथ मिलकर बार-बार प्रयोग किए जा सकने वाले रॉकेट के निर्माण की योजना पर काम कर रहा है। यह तकनीक अभी केवल अमेरिका और रूस के पास है। इसरो का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक रीयूजेबल रॉकेट को लांच किया जा सके। यह रीयूजेबल रॉकेट के क्षेत्र में प्रदेश का पहला स्टार्टअप है।

वर्ष 2020 से एब्योम टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों की टीम इसरो की निगरानी और मार्गदर्शन में इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। हैदराबाद के इंटरनेशनल इंजीनियरिंग संस्थान बिट्स पिलानी में प्रयोशाला तैयार कराई गई है। करीब आधा एकड़ क्षेत्र में एब्योम टेक्नोलॉजी ने रॉकेट के इंजन के एक्सपेरिमेंट के लिए लैब का निर्माण कराया है। प्रोजेक्ट के लिए एब्योम टेक्नोलॉजी ने इसरो के साथ दो अलग-अलग एमओयू साइन किए हैं।

इसरो के साइंटिस्ट कर रहे मदद
इसरो के वैज्ञानिक इस प्रोजेक्ट में एब्योम टेक्नोलॉजी की टीम को टेक्निकल मेंटोर कर रहे हैं। एब्योम टेक्नोलॉजी के संस्थापक जैनुल आब्दीन ने बताया कि बार-बार प्रयोग किए जा सकने वाले रॉकेट में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका इंजन होता है। पिछले 2 साल में बिट्स में बनी प्रयोगशाला में 100 से अधिक बार इंजन का टेस्ट रन हो चुका है। उसमें सुधार की गुंजाइश लगातार बनी हुई है।

इस प्रकार का प्रयोग करने वाली एब्योम टेक्नोलॉजी देश की पहली निजी क्षेत्र की प्रयोगशाला है। इसके अलावा यह सुविधा देश के तीन सरकारी संस्थानों में उपलब्ध है। इसमें इसरो, आईआईटी चेन्नई और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज बेंगलुरु शामिल है। एब्योम टेक्नोलॉजी का लक्ष्य है कि वर्ष 2027 तक इंजन मानकों के मुताबिक बेहतर बनाने में सफलता मिल जाए। प्रयोग में बिट्स पिलानी के इंजीनियर भी जुटे हुए हैं।

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90 लाख का मिला है अनुदान
मूल रूप से कुशीनगर के रहने वाले जैनुल आब्दीन ने गोरखपुरी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। उनका कहना है कि वर्ष 2020 में इसरो के साथ स्टार्टअप के रूप में समझौता हुआ है। इसके तहत कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जाकर छात्रों को अंतरिक्ष विज्ञान से जोड़ने के अभियान में एब्योम टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ लगे हैं। अभी इस टीम में 70 से अधिक सदस्य हो गए हैं। केंद्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी मंत्रालय, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने अब तक करीब 90 लाख रुपये का अनुदान दिया है।

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