आस्था भट्टाचार्य
सोमनाथ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यह समयचक्र है, सोमनाथ को ध्वस्त करने की मंशा लेकर आए मजहबी आक्रांता आज इतिहास के कुछ पन्नों में सिमट कर रह गए हैं और सोमनाथ मंदिर उसी विशाल समुद्र के किनारे गगनचुंबी धर्मध्वजा को थामे खड़ा है।’
बांग्लादेश के हिंदू विरोधी तत्वों के लिए सोमनाथ से पीएम मोदी की दहाड़ को एक बड़े संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। पीएम मोदी ने गुजरात की धरती से समानता और हिंदुत्व की ताकत के ऐसे उदाहरण पेश किए, जिन्हें सुनकर मोहम्मद युनूस कांप उठे होंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘सोमनाथ का इतिहास विनाश और पराजय का इतिहास नहीं है, यह विजय और पुनर्निमाण का है। हमारे पूर्वजों के पराक्रम का है, हमारे पूर्वजों के त्याग और बलिदान का है। आक्रांता आते रहे लेकिन हर युग में सोमनाथ पुन: स्थापित होता रहा, इतनी सदियों का संघर्ष, इतना महान धैर्य, सृजन और पुनर्निमाण का यह जीवट, दुनिया के इतिहास में ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘जब महमूद गजनी से लेकर औरंगजेब तक तमाम आक्रांता सोमनाथ पर हमला कर रहे थे तो उन्हें लग रहा था कि उनकी तलवार सनातन सोमनाथ को जीत रही है, वे मजहबी कट्टरपंथी यह नहीं समझ पाए कि जिस सोमनाथ को वे नष्ट करना चाहते हैं उसके नाम में ही ‘सोम’ अर्थात ‘अमृत’ जड़ा हुआ है। उसके ऊपर सदाशिव महादेव के रूप में वह चैतन्य शक्ति प्रतिष्ठित है जो कल्याणकारी भी है और शक्ति का स्रोत भी है।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तो बार-बार मन में प्रश्न आ रहा है कि ठीक 1000 वर्ष पहले, ठीक इसी जगह पर क्या माहौल रहा होगा? अपनी आस्था, अपने विश्वास, अपने महादेव के लिए हमारे पुरखों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। 1000 साल पहले वह आक्रांता सोच रहे थे कि हमें जीत लिया कि आज 1000 साल बाद भी सोमनाथ महादेव के मंदिर पर फहरा रही ध्वजा पूरी सृष्टि का आह्वान कर रही है कि हिंदुस्तान की शक्ति क्या है, उसका सामर्थ्य क्या है, यहां का कण-कण वीरता और साहस का साक्षी है।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘हमारे धर्म के प्रति ईमानदार कोई भी व्यक्ति ऐसी कट्टरपंथी सोच का समर्थन नहीं करेगा लेकिन तुष्टिकरण के ठेकेदारों ने हमेशा इस कट्टरपंथी सोच के आगे घुटने टेके। जब भारत गुलामी की बेड़ियों से मुक्त हुआ, जब सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निमाण की शपथ ली तो उन्हें भी रोकने की कोशिश की गई। 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के यहां आने पर भी आपत्ति जताई गई, आज भी हमारे देश में वह ताकतें मौजूद और पूरी तरह सक्रिय हैं जिन्होंने सोमनाथ पुनर्निमाण का विरोध किया। आज तलवारों की जगह दूसरे कुत्सित तरीके से भारत के खिलाफ षड्यंत्र हो रहे हैं इसलिए हमें ज्यादा सावधान रहना है, हमें खुद को शक्तिशाली बनाना है, हमें एकजुट रहना है।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘अगर किसी देश के पास 100 साल पुरानी विरासत होती है तो वह देश उसे अपनी पहचान बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है, वहीं भारत के पास सोमनाथ जैसे हजारों साल पुराने पुण्य स्थान है, लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद गुलामी की मानसिकता वाले लोगों ने उनसे पल्ला झाड़ने की कोशिश की, उस इतिहास को भूलाने के प्रयास हुए। हम जानते हैं कि सोमनाथ की रक्षा के लिए देश ने कैसे-कैसे बलिदान दिए थे, कितने ही नायकों का इतिहास सोमनाथ मंदिर से जुड़ा है लेकिन दुर्भाग्य से इसे कभी उतना महत्व नहीं दिया गया बल्कि आक्रमण के इतिहास को भी कुछ राजनेताओं और इतिहासकारों द्वारा व्हाइटवॉश करने की कोशिश की गई।’
‘सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में आने से मना किया था नेहरू ने’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात की धरती से कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ पर पीएम मोदी ने कहा कि तुष्टिकरण के ठेकेदारों ने कट्टरपंथी ताकतों के सामने घुटने टेक दिए। जब सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निमाण की शपथ ली तो उन्हें भी रोकने की कोशिश की गई।
सोमनाथ में लोगों को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि दुर्भाग्य से आज भी हमारे देश में वो ताकतें मौजूद हैं। पूरी तरह सक्रिय हैं, जिन्होंने सोमनाथ पुनर्निमाण का विरोध किया था। पीएम मोदी ने आगे कहा कि 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के यहां आने पर भी आपत्ति जताई गई। उस समय सौराष्ट्र के मशहूर हमारे जामनगर के महाराज दिग्विजय सिंह आगे आए।
नेहरू ने चिट्ठी लिखकर किया था फैसले का विरोध
दरअसल, साल 1951 और तारीख 11 मई को गुजरात में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन हुआ। तब प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे और उन्होंने इस समारोह में शामिल होने से साफतौर पर इनकार कर दिया। इसके बाद देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। प्रधानमंत्री के पद पर बैठे पंडित जवाहर नेहरू ने तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद के इस फैसले पर आपत्ति जताई। उन्होंने बकायदा चिट्ठी लिखकर राष्ट्रपति के इस फैसले का विरोध किया था। तब कुछ लोगों ने भी नेहरू का खुलकर समर्थन किया था, जिसे नेहरू ने चुनाव में जमकर भुनाया।

