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नए भारत में क्या फैक्टि्रयों का दौर तेजी से शुरू होगा?

Will the era of factories start rapidly in the new India?
ब्लिट्ज ब्यूरो

भारत आज अपनी आर्थिक यात्रा के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता देश की रोजगार व्यवस्था, कमाई और विकास की दिशा तय करेगा। सवाल सीधा है कि क्या भारत अब फैक्टि्रयों का देश बनेगा, या फिर सिर्फ उपभोक्ता बाज़ार बनकर रह जाएगा?
अब तक भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र पर टिकी रही है। आईटी, बैंकिंग और दफ़्तरों से जुड़ी नौकरियों ने विकास को गति दी, लेकिन फैक्टि्रयों की कमी के कारण बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं बन पाया। इसी वजह से करोड़ों लोगों को काम की तलाश में शहरों की ओर जाना पड़ा।
अब सरकार का ज़ोर इस बात पर है कि भारत में ज़्यादा सामान बने, देश के युवाओं को यहीं काम मिले और वही सामान विदेशों में निर्यात हो।
सरकार की रणनीति
सरकार ने इसके लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना लागू की है। इस योजना के तहत मोबाइल, दवाइयां, ऑटोमोबाइल, सोलर, डिफेंस और सेमीकंडक्टर जैसे कई क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
सरकार का मानना है कि इससे
रोज़गार के नए अवसर बनेंगे
उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा
आयात पर निर्भरता घटेगी
देश की आर्थिक स्थिति मज़बूत होगी

मैन्युफैक्चरिंग क्यों है अहम ?
आज भारत की अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान लगभग 15–16 प्रतिशत है, जो कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कम है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक फैक्ट्रियां नहीं बढ़ेंगी, तब तक बड़े पैमाने पर स्थायी रोज़गार संभव नहीं है।

मैन्युफैक्चरिंग बढ़ने से
युवाओं को हुनर आधारित काम मिलेगा
छोटे और मझोले उद्योग मजबूत होंग
शहरों पर आबादी और रोज़गार का दबाव कम होगा
दुनिया भारत की ओर क्यों देख रही है?
आज वैश्विक कंपनियां सिर्फ़ एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। वे नए उत्पादन केंद्र तलाश रही हैं। इसी कारण भारत के सामने एक ऐतिहासिक अवसर आया है।
भारत के पास बड़ा बाजार, मेहनती कार्यबल और राजनीतिक स्थिरता है लेकिन मुकाबला आसान नहीं है। वियतनाम, इंडोनेशिया और मैक्सिको जैसे देश तेज फैसलों और आसान प्रक्रियाओं के साथ निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। भारत को भी रफ़्तार बढ़ानी होगी।
चुनौतियों से सामना
हालांकि पिछले वर्षों में सड़कों, बंदरगाहों और औद्योगिक क्षेत्रों में सुधार हुआ है, फिर भी कुछ समस्याएं बनी हुई हैं
ज़मीन मिलने में देरी
नियमों की जटिलता
बिजली और पूंजी की लागत
छोटे उद्योगों को सीमित मदद
इन बाधाओं को दूर किए बिना बड़े निवेश और बड़े नतीजे मुश्किल हैं।
सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक भारत 500 अरब डॉलर का मैन्युफैक्चरिंग निर्यात करे। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह लक्ष्य संभव है, लेकिन इसके लिए नीति और ज़मीनी अमल—दोनों में निरंतरता जरूरी है।
मोबाइल, इलेक्टि्रक वाहनों के पुर्ज़े, सोलर उपकरण, डिफेंस उत्पादन और सेमीकंडक्टर आने वाले समय में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
निर्णायक दौर
यह मौका लंबे समय तक नहीं रहेगा। अगर भारत ने अब सही और तेज फैसले नहीं लिए, तो वैश्विक कंपनियां किसी और देश का रुख कर सकती हैं लेकिन यदि नीति, निवेश और अमल एक साथ आगे बढ़े, तो भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है। रोज़गार बढ़ेगा, कमाई बढ़ेगी और देश आर्थिक रूप से और मज़बूत होगा।
मैन्युफैक्चरिंग का मौजूदा योगदान: 15–16%
2030 का निर्यात लक्ष्य: 500 अरब डॉलर
प्रमुख क्षेत्र: मोबाइल, ईवी, सोलर, डिफेंस, सेमीकंडक्टर
वैश्विक प्रतिस्पर्धा: वियतनाम, इंडोनेशिया, मैक्सिको

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