ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। केंद्रीय बजट से इस बार ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। कई वर्षों बाद केंद्र सरकार ने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को एक भी पैसा नहीं दिया है। यह ऐसे समय में हुआ है, जब ईरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियां झेल रहा है और भारत इस बंदरगाह पर मिली अमेरिकी पाबंदियों से छूट की मियाद पूरे होने के दिन गिन रहा है। ईरान को छोड़ भी दें तो भारत के लिए चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट ने सिर्फ इसके व्यापारिक हित के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, बल्कि सामरिक रूप से भी यह बहुत ज्यादा संवेदनशील बन चुका है।
चाबहार बंदरगाह को भारत और ईरान मिलकर विकसित कर रहे हैं। इस काम के लिए भारत पिछले कई वर्षों से सालाना 100 करोड़ रुपये का आवंटन करता आया है लेकिन, इस बार के केंद्रीय बजट में इसके लिए कोई राशि आवंटित नहीं की गई है। अमेरिका ने चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन इसने भारत को इस पाबंदी से अप्रैल 2026 तक की छूट दे रखी है। पहले इसकी मियाद पिछले साल अक्टूबर में खत्म हो रही थी, जिसे अमेरिका ने सितंबर में 6 महीने के लिए बढ़ा दिया था। पिछले महीने विदेश मंत्रालय की ओर से बताया गया था कि इस मामले में उसकी अमेरिका से लगातार बातचीत चल रही है।
ईरान से कारोबार पर 25% टैरिफ की धमकी
इस बीच अमेरिका यह भी धमकी दे चुका है कि ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर वह अतिरिक्त 25% की टैरिफ लगा देगा। भारत ट्रंप के इस रवैए का खामियाजा रूस के मामले में पहले से ही भुगत रहा (50% टैरिफ) है। ऐसे में भारत ने जिस तरह से चाबहार पोर्ट की फंडिंग रोकी है, उससे यही संकेत मिलता है कि वह फिलहाल इस प्रोजेक्ट पर खुलकर आगे बढ़ने की नहीं सोच रहा। हालांकि, आधिकारिक तौर पर भारत अभी भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बना हुआ है।
चाबहार बंदरगाह पर ईरान से 10 वर्ष की संधि
मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत स्थानीय ईरानी स्टाफ की मदद से फिलहाल इस प्रोजेक्ट को मैनेज कर रहा है, ताकि अमेरिकी नियमों के लफड़ों में न फंस पाए। हालांकि, भारत की ओर से इन दावों की पुष्टि नहीं की गई है। भारत ने 2024 में इस प्रोजेक्ट के संचालन के लिए 10 साल का करार किया था, जिसमें लगातार निवेश होना था।
































