ब्लिट्ज ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि आत्मविश्वास से भरा भारत विश्व के लिए आशा की किरण बना है। यूरोपीय संघ के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता महत्वाकांक्षी भारत, आकांक्षावान युवाओं व आत्मनिर्भर भारत के लिए है।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 से अनेक संभावनाएं जागी हैं। कुल मिलाकर इस आर्थिक सर्वेक्षण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की एक सुखद तस्वीर पेश की है। 1 फरवरी अर्थात रविवार को पेश किए गए बजट को एक विकासोन्मुख बजट कहा जा सकता है। तमाम विकट चुनौतियों के बावजूद बीतता हुआ वित्त वर्ष भारत के लिए ठीक-ठाक रहा है। आगामी वित्त वर्ष में भी उम्मीद की चमकदार किरणों की रोशनी बरकरार रहने की प्रबल संभावनाएं बनी रहेंगी। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार सरकार ने वित्त वर्ष 2027 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 6.8 प्रतिशत से 7.2 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया है। जिस प्रकार के बाहरी व आंतरिक तनावों से देश की अर्थव्यवस्था गुजर रही है उसमें लगभग 7 सात प्रतिशत विकास दर अत्यधिक उत्साहवर्धक मानी जा रही है। अमेरिका के टैरिफ युद्ध के बावजूद भारत की प्रगति यही संकेत देती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने अनावश्यक रूप से झुकने की कतई अवश्यकता नहीं है। यह बात गौर करने लायक है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद, वित्त वर्ष 2025 में भारत का कुल निर्यात (वस्तु और सेवाएं) रिकॉर्ड 825.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया और वित्त वर्ष 2026 में भी यही गति कायम रहेगी। भारी अमेरिकी टैरिफ के बावजूद अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान उत्पाद निर्यात में बाहरी व आंतरिक तनावों से जिस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था गुजर रही है, उसमें करीब सात प्रतिशत विकास दर उत्साहजनक है। इससे निवेशकों का मनोबल बढ़ेगा।
यही नहीं, देश में सबसे निचले तबके की पांच से दस फीसद आबादी के उपभोग व्यय में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। यानी इस वर्ग के लोग अपनी जरूरत के लिए विभिन्न वस्तुओं की खरीद पर अब ज्यादा खर्च करने लगे हैं। यह इस बात का संकेत भी है कि गरीबों की माली हालत में सुधार हुआ है। संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा रपट में गरीबी का दायरा कम होने की यह तस्वीर उकेरी गई है। इसमें कहा गया है कि सरकार के सब्सिडी, पेंशन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक व्यय को प्राथमिकता जैसे कदमों के परिणामस्वरूप कमजोर वर्ग अभाव से उबरे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में तस्वीर बदली है। विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा द्वारा भारत को दी गई सलाह कि वह टैरिफ पर कम और व्यापारिक अवसरों पर अधिक ध्यान दे; मात्र एक टिप्पणी नहीं है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते मिजाज में भारत की भूमिका को रेखांकित करने वाला संकेत भी है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यापार भू-राजनीतिक तनावों और अमेरिका की उच्च टैरिफ वाली नीतियों की वजह से अनिश्चितता से घिरा हुआ है। यही कारण है कि आज भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को नए अवसरों की तलाश में सक्रिय भी होना पड़ा है और भारत की अर्थव्यवस्था में निर्यात का हिस्सा अब भी कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का तकरीबन 20-22 फीसदी ही है जबकि कई अन्य देशों में यह 40 से 60 फीसदी तक पहुंच चुका है। ऐसे में टैरिफ की दीवारें खड़ी करने के बजाय नए बाजारों में प्रवेश और व्यापार समझौतों के जरिये वृद्धि हासिल करना अधिक फायदेमंद हो सकता है। भारत- यूरोपीय यूनियन (ईयू) के बीच एफटीए इसी दिशा में एक मील का पत्थर है। इसमें दोनों पक्षों ने टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम किया है। इसकी सराहना विश्व बैंक ने भी की है। वर्तमान में भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्र वस्त्र, फार्मास्युटिकल, आईटी सेवाएं, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग का सामान हैं। यूरोपीय संघ के बाजार में प्रवेश से इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, कृषि उत्पाद और हरित ऊर्जा से जुड़े उत्पादों के क्षेत्र में नई संभावनाएं खुलेंगी। हालांकि, इससे घरेलू उद्योगों, खासकर एमएसएमई को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए तैयार करना होगा। इसलिए सरकार को व्यापार समझौतों की राह को आगे बढ़ाने के साथ ही घरेलू उद्योगों को सब्सिडी, कौशल विकास और तकनीकी सहायता पर भी ध्यान देना होगा। विश्व बैंक के अध्यक्ष ने पांच ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें व्यापक रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। ये हैं-अवसंरचना, कृषि, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, पर्यटन और मूल्यवर्धित विनिर्माण। इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर भारत न केवल टैरिफ के दबाव से उबर सकता है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रंखला में अपनी स्थिति भी मजबूत कर सकता है।
इस बीच पिछले दिनों सरकार द्वारा किए गए कर सुधारों ने परिवारों की व्यय योग्य आय बढ़ाई जिससे शहरी उपभोग में भी सुधार आया। महंगाई पर नियंत्रण भी उत्साहजनक है। अप्रैल से दिसंबर, 2025 के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति 1.7 फीसदी तक गिर गई। सकारात्मक बात यह है कि आरबीआई और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, दोनों अनुमान लगा रहे हैं कि आने वाले वर्ष में मुद्रास्फीति धीरे-धीरे बढ़ेगी, पर यह आरबीआई के चार फीसदी के लक्ष्य के भीतर ही रहेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि आत्मविश्वास से भरा भारत विश्व के लिए आशा की किरण बना है। साथ ही उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता महत्वाकांक्षी भारत के लिए है और देश के विनिर्माताओं को इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी क्षमताएं बढ़ानी चाहिए। यह समझौता महत्वाकांक्षी भारत, आकांक्षावान युवाओं व आत्मनिर्भर भारत के लिए है। उन्होंने कहा, मैं सभी प्रोड्यूसरों से कहूंगा कि इसे दुनिया में ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ यानी सभी समझौतों की जननी कहा जा रहा जिससे अब एक विशाल बाजार खुल गया है। इसका लाभ सभी को मिलेगा और रोजगार के अनेक अवसर बढ़ेंगे। केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने भी संसद में कहा है कि रोजगार के अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं। बेरोजगारी दर में लगातार गिरावट आ रही है। बीते एक साल में 18,000 से अधिक रोजगार मेले आयोजित किए गए और कुल 2.22 करोड़ लोगों को रोजगार मिला। बेरोजगारी दर घटकर 3.2 प्रतिशत रह गई है जो कई विकसित देशों से भी कम है।
































