ब्लिट्ज ब्यूरो
लखनऊ। अलीगढ़ मंडल को इस बार के प्रदेश बजट में मिली घोषणाएं केवल योजनाओं की सूची भर नहीं लगतीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी देती हैं। खेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और शहरी विकास लगभग हर प्रमुख वर्ग को साधने की कोशिश दिखाई देती है। ऐसे समय में जब अगले वर्ष चुनाव की आहट सिर पर है; इन घोषणाओं के राजनीतिक मायने भी निकाले जाना स्वाभाविक है।
स्कूल, कॉलेज, मेडिकल संस्थान और छात्रावास के जरिए सरकार ने युवाओं और मध्यवर्ग को सीधा संदेश दिया है। दूसरी ओर एक जनपद-एक व्यंजन के तहत अलीगढ़ की चमचम और हाथरस की रबड़ी को बढ़ावा देकर स्थानीय पहचान और छोटे कारोबारियों को भी साधने का प्रयास झलकता है। गन्ना मूल्य में वृद्धि किसानों को राहत का संकेत देती है हालांकि स्थानीय चीनी मिल को विशेष बजट न मिलना कुछ सवाल भी खड़े कर रहा है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का अहम हिस्सा होने के कारण अलीगढ़ मंडल का राजनीतिक महत्व अलग है। यहां जातीय, शैक्षिक और आर्थिक कारक चुनावी परिणामों को प्रभावित करते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह बजट क्षेत्रीय संतुलन के साथ-साथ सामाजिक और चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर तैयार किया दस्तावेज भी माना जा सकता है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद मोहिबुल हक का मानना है कि चुनाव से पहले लोकलुभावन बजट लाने की परंपरा रही है लेकिन आखिर में जनता यह तय करती है कि भरोसा कितना किया जाए क्योंकि असली कसौटी क्रियान्वयन है। अलीगढ़ में यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि जनता विकास भी देख रही है और सड़क जाम से लेकर गंदगी भी दिखाई दे रही है।
घोषणाओं में युवाओं पर साफ फोकस दिखता है जिनकी चुनाव में हिस्सेदारी भी अहम है। यानी सवाल यही है कि यदि घोषणाएं समयबद्ध तरीके से जमीन पर उतरीं तो यह बजट विकास का रोडमैप कहलाएगा। लेकिन यदि देरी या आधे-अधूरे अमल की कहानी दोहराई गई तो विपक्ष इसे चुनाव से पहले किया गया विश्वास का निवेश बताने से नहीं चूकेगा।





























