दीपक द्विवेदी
वस्तुत: आज दुनिया को भगवान श्रीराम के सकारात्मक विचारों, आचारों और आविष्कारों की जरूरत है जो विश्व को शांति और समृद्धि की ओर ले जाएं। इसमें भारत की सांस्कृतिक निरंतरता अहम भूमिका निभा सकती; यह बात अब विश्व को भी समझ आने लगी है।
असत्य पर सत्य, अनैतिकता पर नैतिकता एवं मानवता की विजय का संदेश देने वाला पर्व विजयादशमी; जिसे दशहरा भी कहा जाता है, गत 12 अक्टूबर को धूमधाम से मनाया गया पर इस पर्व के जो गहरे निहितार्थ हैं उन्हें समझने और उनको अपने जीवन में उतार कर उन पर अमल किए जाने की आज महती आवश्यकता है। आज पूरी दुनिया कहीं न कहीं, किसी न किसी समस्या से जूझ रही है। कहीं कुछ देश युद्ध की विभीषिका से त्रस्त हैं तो कहीं कुछ देश गृहयुद्ध अथवा आतंकवाद के शिकार हैं। ऐसे में यह पर्व हमें प्रेरणा देता है कि हम सिर्फ अपने बारे में ही न सोचें बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थों और लाभ-हानि से ऊपर उठ कर मानव मात्र के कल्याण के लिए कार्य करें। यही भाव हमारे मूल मंत्र ‘वसुधैव कुटुंबकम ्’ का भी है जो हमें इस ज्ञान का बोध कराता है कि हम संपूर्ण पृथ्वी को अपना परिवार मानें और पूरी मानवता के कल्याण को आपना ध्येय। भगवान श्रीराम भी जीवन भर इसी पथ पर चले और मानव मात्र का कल्याण ही अपना कर्तव्य समझा।
वस्तुत: भगवान श्रीराम से जुड़े इस विजयदशमी पर्व का संदेश हर युग में प्रासंगिक रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने अधर्मी रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी। इसके अलावा, एक अन्य मान्यता यह भी है कि इस दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था, इसलिए इस दिन को विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता कोई भी हो किंतु दोनों का ध्येय एक ही है- मानवता का कल्याण। आज इसी भाव को लोगों तक पहुंचाना जहां बहुत जरूरी हो गया है। भारत ही नहीं ; दुनिया तक भी यह संदेश किसी न किसी रूप में जाना चाहिए कि बुरे काम का बुरा नतीजा तो भुगतना ही पड़ता है।
आज विश्व को कदम-कदम पर सहारे की आवश्यकता है। हर जगह चुनौतियां हैं। वर्ष 2020 से 22 तक तो महामारी की भेंट चढ़ ही गए थे पर उसके बाद विश्व भीषण युद्धों की चपेट में आ गया है। वर्ष 2024 भी समाप्ति की ओर है पर शायद ऐसा लगता है कि हमने महामारी के महासंकट से जो थोड़ा बहुत मानव प्रेम का पाठ सीखा था; उसे भुलाने में हमने ज्यादा वक्त नहीं लगाया। कोविड-19 के दौरान ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा’ का जो पैगाम सारी दुनिया तक फैला था; उसकी यादें अब हमारे दिमाग में तेजी से धूमिल होती जा रही हैं। इस समय हजारों लोग युद्ध और सैकड़ों लोग आतंकी हिंसा या गृहयुद्धों में अपनी जान गंवा रहे हैं। इसका सीधा अर्थ तो यही निकलता है कि पूरी दुनिया में रावणों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी है। भगवान श्रीराम के जगत कल्याण वाले भाव का आज सर्वथा अभाव सा दिखाई पड़ रहा है। रूस या यूक्रेन के बीच युद्ध हो अथवा इजरायल और हमास समर्थकों के बीच संघर्ष; हर जगह ‘रामभाव’ का अभाव नजर आ रहा है? दिख रही है तो सिर्फ ‘रावण भाव’ की अधिकता। प्रतिशोध की ज्वाला का विकराल रूप, इसके सिवा कुछ नहीं; जबकि प्रभु श्रीराम तो संयम और मर्यादा की जीवंत प्रतिमूर्ति थे।
देखा जाए तो प्रतिशोध भगवान श्रीराम ने भी लिया था किंतु अंत तक उनकी यही कोशिश रही थी कि हथियार उठाने की नौबत नहीं आए। ऐसा नहीं है कि प्रभु श्रीराम की इस कथा के सार से इजरायल अथवा ईरान अनभिज्ञ हैं किंतु दोनों ही देशों ने शांति की परिभाषा अपने-अपने हिसाब से गढ़ ली है। समय-समय पर ये एक-दूसरे को नेस्तनाबूद कर देने की घोषणा करते रहते हैं। भगवान श्रीराम ने तो रावण को हरा कर भी उसके भाई को ही लंका का राजा बना दिया था पर आज तो विश्व के अनेक देश दूसरे देशों की जमीन हड़पने की जुगत में लगे हैं। ऐसे में युद्ध की प्रकृति पर लगाम कैसे लगेगी? यह एक विचारणीय प्रश्न है। यही नहीं, विश्व आज प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं से भी जूझ रहा है। खान-पान के तौर-तरीकों का संकट भी मुंह बाये खड़ा है। ऐसे में भारत ही एक ऐसा देश है जिसकी ओर पूरी दुनिया की आस टिकी नजर आती है। आज युद्धों का शांतिपूर्ण समाधान खोजने के लिए विश्व भारत की ओर देख रहा है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार हर वैश्विक मंच से यह दोहरा रहे हैं कि आज का युग युद्ध का युग नहीं है। मोदी इन युद्धों का हल खोजने के प्रयासों में जुटे भी हैं। इसके अतिरिक्त वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर को भी समस्याओं का हल भारत में नजर आ रहा है। उसकी हाल ही में जारी लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट-2024 में भी बताया गया है कि भारतीयों के खानपान की आदतों से ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कम होता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि यदि सभी देश भारत कै पैटर्न को अपना लें तो 2050 तक पृथ्वी को होने वाला नुकसान काफी कम हो जाएगा। वस्तुत: आज दुनिया को भगवान श्रीराम के सकारात्मक विचारों, आचारों और आविष्कारों की जरूरत है जो विश्व को शांति और समृद्धि की ओर ले जाएं। इसमें हजारों साल से चली आ रही भारत की सांस्कृतिक निरंतरता अहम भूमिका निभा सकती; यह बात अब विश्व को भी समझ आने लगी है।






























