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हर साल बच रही हजारों नन्हे-मुन्नों की जान

Saving the lives of thousands of little ones every year
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत मिशन’ का असर दिखने लगा है। इस अभियान से हजारों की संख्या में नन्हे-मुन्नों बच्चों की जिंदगी बच रही है। नेचर जर्नल में छपी एक रिसर्च में इसका खुलासा हुआ है। रिसर्च में बताया गया है कि साल 2011 से 2020 के बीच हर साल 60,000 से 70,000 बच्चों की जान शौचालय बनने की वजह से बच पाई है। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इस रिसर्च को अपने एक्स अकाउंट पर शेयर किया है। उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है इस अध्ययन ने स्वच्छ भारत मिशन जैसे प्रयासों के प्रभाव को उजागर किया। उचित शौचालयों तक पहुंच शिशु और बाल मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्वच्छता, सफाई सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गेम-चेंजर बन गई है। मुझे खुशी है कि भारत ने इसमें अग्रणी भूमिका निभाई है।

किसने किया रिसर्च
यह रिसर्च इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने मिलकर की है। उन्होंने 2011 से 2020 तक 35 राज्यों और 640 जिलों में शिशु मृत्यु दर और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर का अध्ययन किया। रिसर्च पेपर के लेखक सोयरा गुने ने कहा कि कम और मध्यम आय वाले देशों में मृत्यु दर को कम करने पर ज्यादातर ध्यान गर्भावस्था और प्रसव के बाद के समय में बचाव और इलाज पर केंद्रित होता है। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट के रिसर्च एनालिस्ट, गुने कहते हैं कि इन देशों में स्वच्छता में बड़े पैमाने पर निवेश और मृत्यु दर के बीच संबंध पर बहुत कम सबूत उपलब्ध हैं।

पानी और स्वच्छता की स्थिति में सुधार का असर
स्वच्छ भारत मिशन का मकसद घरों, कम्यूनिटी और सार्वजनिक जगहों पर शौचालयों का निर्माण करना था। इसमें गंदे शौचालयों को फ्लश वाले शौचालयों में बदलना और कचरा प्रबंधन सिस्टम को विकसित करना भी शामिल था। गुने बताते हैं कि उनके शोध से पता चलता है कि पानी और स्वच्छता की स्थिति में सुधार से शिशु मृत्यु दर को कम किया जा सकता है। यह खास तौर पर भारत जैसे देशों में अहम है, जहां खुले में शौच की समस्या बहुत ज्यादा है।

– नेचर जर्नल की रिसर्च में खुलासा
– पीएम मोदी ने किया रिसर्च का जिक्र, बताया कैसे है गेमचेंजर

झांसी को मिली तीसरी रैंक
स्वच्छ सर्वेक्षण में देश के 131 शहरों में झांसी को मिली तीसरी रैंक, हवा की क्वालिटी में हुआ 19 फीसदी सुधार।
2 सितंबर को नेचर में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि जिन जिलों में स्वच्छ भारत मिशन के तहत 30 फीसदी से ज्यादा टॉयलेट्स का निर्माण हुआ, वहां शिशु मृत्यु दर में 5.3 की कमी आई। वहीं पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 6.8 से कम रही। रिपोर्ट में कहा गया कि स्वच्छ भारत मिशन के बाद भारत में स्वच्छ भारत मिशन से पहले के वर्षों की तुलना में शिशु और बाल मृत्यु दर में तेजी से गिरावट देखी गई। यह मिशन 2014 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य क्षेत्र को खुले में शौच से मुक्त बनाना और सफाई की व्यवस्था ठीक करना था।

केंद्र तेजी से आगे बढ़ाएगा स्वच्छता अभियान
केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार, मिशन का दूसरा फेज लागू किया जा रहा है। इसमें 2026 तक भारतीय शहरों को कचरा मुक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। यह शोध स्वच्छता सुविधाओं की उपलब्धता और शिशुओं और बच्चों की मौतों के बीच सीधा संबंध बताता है। भारत के राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान पर जोर का असर है कि शिशु और बाल मृत्यु दर में कमी आई है। रिसर्च में पाया गया कि राष्ट्रीय स्वच्छता अभियानों को बेहतर तरीके से चलाया जाए तो बच्चों के हेल्थ पर अच्छा असर रहेगा।

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