ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नाकाम या टूटे रिश्तों को दुष्कर्म या अन्य अपराध का रूप दिए जाने को परेशान करने वाली आदत बताते हुए कहा कि ऐसे मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली का गलत इस्तेमाल चिंता की बात है। ऐसे ही दुष्कर्म के एक आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, हर खराब रिश्ते को दुष्कर्म का जुर्म बताना न सिर्फ अपराध की गंभीरता को कम करता है, बल्कि आरोपी पर कभी न मिटने वाला कलंक लगाता है और गंभीर अन्याय करता है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि दुष्कर्म का अपराध सबसे गंभीर किस्म का है और इसे सिर्फ उन्हीं मामलों में लगाया जाना चाहिए जहां असल में, जबरदस्ती या बिना सहमति के यौन हिंसा हुई हो।
पीठ ने कहा, एक अच्छे रिश्ते के दौरान बने शारीरिक संबंधों को सिर्फ इसलिए दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि कानून को उन असली मामलों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए जहां भरोसा टूटा हो और इज्जत का उल्लंघन हुआ हो। कोर्ट ने कहा, इस कोर्ट ने कई मौकों पर इस परेशान करने वाली आदत पर ध्यान दिया है, जिसमें नाकाम या टूटे हुए रिश्तों को अपराध का रंग दे दिया जाता है।
शीर्ष कोर्ट ने एक शख्स की अपील पर अपने फैसले में यह टिप्पणी की। इस शख्स ने बॉम्बे हाई कोर्ट के मार्च, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें छत्रपति संभाजीनगर में अगस्त 2024 में दर्ज प्राथमिकी को रद करने की उसकी अर्जी खारिज कर दी गई थी। शीर्ष कोर्ट ने कहा, इस मामले में दुष्कर्म का आरोप पूरी तरह शिकायतकर्ता महिला के इस दावे पर टिका है कि आदमी ने शादी का झूठा भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
तीन साल तक चला रिश्ता
पीठ ने कहा, हमें लगता है कि यह मामला ऐसा नहीं है जिसमें अपीलकर्ता ने प्रतिवादी महिला को सिर्फ शारीरिक सुख के लिए फुसलाया और फिर गायब हो गया। यह रिश्ता तीन साल तक चला, जो लंबा समय है। पीठ ने कहा, ऐसे मामलों में, एक सही चलते रिश्ते के दौरान हुई शारीरिक निकटता को सिर्फ इसलिए दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया।
दुष्कर्म के असली मामलों के प्रति
संवेदनशील होना जरूरी
पीठ ने कहा, हमें इस बात का एहसास है कि हमारे देश में शादी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है। ऐसे में कानून को उन असली मामलों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए जहां भरोसा तोड़ा गया हो और इज्जत को ठेस पहुंचाई गई हो, ताकि पहले के भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म के लिए सजा) का सुरक्षा का दायरा असल में परेशान लोगों के लिए सिर्फ एक औपचारिकता बनकर न रह जाए। साथ ही, इस सिद्धांत का इस्तेमाल भरोसेमंद सबूतों और ठोस तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि बिना सबूत वाले आरोपों या नैतिक अंदाजों पर।
प्राथमिकी से ही रिश्ते का पता चलता है
पीठ ने कहा, हाईकोर्ट यह समझने में नाकाम रहा कि प्राथमिकी को सीधे पढ़ने से ही पता चलता है कि पार्टियों के बीच रिश्ता असल में आपसी सहमति से बना था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जिन कामों की शिकायत की गई है, वे उस समय अपनी मर्जी से बने रिश्ते के दायरे में हुए थे। प्राथमिकी और आरोपपत्र रद करते हुए पीठ ने कहा, ऐसे मामलों में अभियोजन जारी रखना कोर्ट मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसा होगा।































