दीपक द्विवेदी
कुल मिला कर यह स्पष्ट है कि मतदाता अब बदलाव और विकास की नई इबारत लिख रहे हैं जिसमें बीजेपी को नई ऊर्जा मिल रही है। अब देखना यह है कि यह जनादेश देश की समग्र राजनीति को भविष्य में कितना प्रभावित करता है।
4 मई, 2026 को घोषित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम भारत की राजनीति में एक नए और महत्वपूर्ण दौर का इशारा कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरल के इन नतीजों ने बीजेपी को देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर हिस्से में अपनी पकड़ मजबूत करने का बड़ा मौका दिया जबकि क्षेत्रीय दिग्गजों को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है। चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हुए इन विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति को नया संदेश दिया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत दर्ज की, असम में सत्ता बरकरार रखी और पुडुचेरी में सहयोगियों के साथ सरकार बचाने में सफलता हासिल की। तमिलनाडु में अभिनेता थलपति विजय की पार्टी तमिझगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर सबको चौंका दिया जबकि केरल में कांग्रेस ने वापसी करते हुए सत्ता परिवर्तन कर दिया। इस चुनाव में बस यही एक उपलब्धि कांग्रेस के नाम कही जा सकती है जबकि अन्य राज्यों में उसका प्रदर्शन हमेशा की तरह अत्यंत निराशाजनक रहा जो इस सबसे पुराने राष्ट्रीय राजनीतिक दल के लिए विशेष रूप से चिंता का प्रश्न है।
इन परिणामों ने यह भी साफ कर दिया है कि बीजेपी अब भी राष्ट्रीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली चुनावी ताकत बनी हुई है। हालांकि दक्षिण भारत में अभी भी उसके सामने चुनौतियां कायम हैं। दूसरी ओर, कई राज्यों में क्षेत्रीय राजनीति में बदलाव के नए संकेत भी दिए हैं। तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके ने सत्ता के पुराने समीकरणों को चुनौती दी है जो दक्षिण की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत लग रही है। दूसरी ओर केरल में वामपंथियों और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव बड़े झटके की तरह आए हैं जिससे उनके राजनीतिक वर्चस्व पर सवाल उठ रहे हैं। क्षेत्रीय दल अब बीजेपी के जन कल्याण, ‘विकास और हिंदुत्व’ के मिश्रित नैरेटिव के सामने कमजोर पड़ रहे हैं। ये परिणाम 2026 की राजनीति को दिशा दे रहे हैं और साबित कर रहे हैं कि बीजेपी अपनी रणनीति में बदलाव कर राज्यों में जीत हासिल कर सकती है। परिणाम दर्शाते हैं कि विपक्षी गठबंधन (इंडिया अलायंस) के सामने अब और भी बड़ी चुनौती है क्योंकि उनके प्रमुख नेता अपनी जमीन बचाने के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं। कुल मिलाकर, पांच राज्यों के ये नतीजे देश में एक ‘बड़ी राजनीतिक हलचल’ का संकेत देने वाले हैं।
इन पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने देश की बदलती राजनीति की नई तस्वीर भी पेश की है। तमिलनाडु में विजय की एंट्री, असम में विवादित वीडियो, बंगाल में रिकॉर्ड मतदान और केरल-पुडुचेरी में नए समीकरणों ने इन चुनावों को विश्लेषकों के लिए खास बना दिया है। देखा जाए तो नतीजे आने से पहले ही ये विधानसभा चुनाव एक बड़ी कहानी लिख चुके थे। केरल के नारियल बागानों से लेकर असम के चाय बागानों तक; इस चुनाव में तेज प्रचार, बदलते समीकरण और डिजिटल दौर की नई राजनीति साफ नजर आई। 4 मई को जो नतीजे आए, उससे पू्र्व ही चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों ने यह दिखा दिया था कि भारत की राजनीति अब बदलाव के दौर से गुजर रही है जहां क्षेत्रीय पहचान, कल्याण योजनाएं और नए चेहरे अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन चुनावों में कई घटनाएं ऐसी रहीं जिन्होंने पूरे देश का ध्यान खींचा और चुनावी माहौल को अलग ही दिशा दी किंतु चुनाव के परिणामों पर इन घटनाओं का असर नहीं पड़ सका।
ऐसे ही पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने का मुद्दा सबसे बड़ा बना रहा। इनमें से 27 लाख लोगों ने अपील की लेकिन बहुत कम लोगों को राहत मिल सकी। इसके बावजूद राज्य में रिकॉर्ड मतदान हुआ और प्रथम बार पहले तथा दूसरे चरण में रिकॉर्ड 92 प्रतिशत से ऊपर मतदान देखने को मिला। यही नहीं बंगाल में इस बार चुनाव प्रचार में ‘मछली’ और ‘झालमुड़ी’ भी बड़ा मुद्दा बन गई।
केरल में इस बार मुकाबला सिर्फ एलडीएफ और यूडीएफ के बीच नहीं रहा। भाजपा ने कई सीटों पर मजबूत चुनौती पेश की जिससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया। पुडुचेरी में भी राजनीति कम दिलचस्प नहीं रही। गठबंधन को लेकर काफी खींचतान रही फिर भी पुडुचेरी में 89.87 प्रतिशत मतदान हुआ जो 1964 के बाद सबसे ज्यादा रहा। कुल मिला कर यह स्पष्ट है कि मतदाता अब बदलाव और विकास की नई इबारत लिख रहे हैं जिसमें बीजेपी को नई ऊर्जा मिल रही है। अब देखना यह है कि यह जनादेश देश की समग्र राजनीति को भविष्य में कितना प्रभावित करता है।













