ब्लिट्ज ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विगत दिवस दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे का उद्धाटन किया। इसकी सबसे खास बात यह है कि शुरुआत के 18 किलोमीटर तक कोई टोल नहीं देना होगा। 212 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे का करीब 135 किलोमीटर (64%) हिस्सा यूपी से होकर गुजरता है।
इसी वजह से ये जितना फायदेमंद उत्तराखंड के लिए है, उतना ही यूपी के लिए भी है। 12 हजार करोड़ की लागत से करीब 4 साल में एक्सप्रेस-वे बनकर तैयार हुआ। जरूरी जगहों पर इंटरचेंज बनाए गए हैं। जहां जंगल है, वहां पूरा का पूरा हिस्सा एलीवेटेड कर दिया गया है। मतलब, नीचे जंगली जानवर और ऊपर फर्राटा भरती गाड़ियां। यह देश का पहला वाइल्डलाइफ कॉरिडोर है। आज हम इस एक्सप्रेस-वे के बारे में सब कुछ जानेंगे। ये भी समझने की कोशिश करेंगे कि इसके बनने से दिल्ली-देहरादून का सफर कितना आसान हो जाएगा।
एशिया का सबसे बड़ा वाइल्डलाइफ कॉरिडोर अभी दिल्ली से देहरादून जाने के लिए लोग नेशनल हाईवे-58 का इस्तेमाल करते हैं। ये रास्ता दिल्ली से गाजियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, रुड़की, हरिद्वार होते हुए देहरादून पहुंचता है। हाईवे पर करीब 10 ऐसे पॉइंट हैं, जहां ट्रैफिक जाम मिलता ही है।
इस सफर में 6 से 7 घंटे का वक्त लग जाता है। इन सब मुश्किलों को देखते हुए फरवरी, 2020 में दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे बनाने का फैसला हुआ। लेकिन रूट में पड़ने वाले जंगलों की वजह से प्रोजक्ट का विरोध होने लगा। बाद में उसका भी हल निकाल लिया गया।
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का एक बड़ा हिस्सा जंगल से होकर गुजरता है
शुरुआत के 18 किलोमीटर तक कोई टोल नहीं इस 6 लेन एक्सप्रेस-वे की शुरुआत दिल्ली में अक्षरधाम से होती है। यहां पहले से हाईवे था, उसे रि-डेवलप किया गया। यहां एक्सप्रेस-वे पर कुल 12 लेन हो जाती हैं। इसमें 6 लेन का एक्सप्रेस-वे और 6 लेन की ही सर्विस रोड है।
दिल्ली-एनसीआर के लोकल ट्रैफिक की वजह से एक्सप्रेस-वे पर भीड़ न बढ़े, इस वजह से शुरुआत के 32 किलोमीटर तक एक्सप्रेस-वे के अगल-बगल 6 लेन की सर्विस रोड बनाई है। दिल्ली में यह एक्सप्रेस-वे करीब 15 किलोमीटर का है।
इसमें गीता कॉलोनी से खजूरी खास तक 6.4 किलोमीटर का हिस्सा एलिवेटेड है। लोनी के पास से एक्सप्रेस-वे यूपी में प्रवेश करता है। यहां तक (कुल 18 km) एक्सप्रेस-वे को टोल फ्री रखा गया है। यहां से आगे बढ़ने पर मंडोला में एक इंटरचेंज है। यहां दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे को ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे से जोड़ा गया है।
गाजियाबाद में 20 से 22 किलोमीटर चलने के बाद एक्सप्रेस-वे बागपत में प्रवेश कर जाता है। यहां 45 से 50 किलोमीटर का हिस्सा है। ये किसी एक जिले में सबसे ज्यादा है। यहां एक्सप्रेस-वे ग्रीनफील्ड है, यानी ये जिस जगह से गुजरा है वहां पहले सड़क नहीं, खेत हुआ करते थे। इसके आगे खेकड़ा, बागपत और बड़ौत में इंटरचेंज बनाए गए हैं।

एक्सप्रेस-वे को डिजाइन करते वक्त इस चीज का ध्यान रखा गया है कि कोई भी शहर छूटे नहीं। जैसे शामली में एक्सप्रेस-वे 35 से 40 किलोमीटर गुजरा है। यहां इंटरचेंज तो बना ही है, साथ ही कैराना में भी बनाया गया है। यहां हरियाणा-यूपी बॉर्डर होने की वजह से यह जरूरी हो जाता है। शामली से आगे बढ़ते हुए एक्सप्रेस-वे यूपी के आखिरी जिले सहारनपुर में प्रवेश करता है। यहां इसकी कुल लंबाई 45 से 50 किलोमीटर है। देवबंद के आगे सहारनपुर में इंटरचेंज बनाया गया है।
जहां ट्रैफिक की समस्या, वहां एक्सट्रा रोड बनाया
212 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे में 113 अंडरपास बनाए गए हैं। 5 रेलवे ओवरब्रिज हैं। 62 बस शेल्टर भी बनाए गए हैं, जहां यात्रियों से जुड़ी सुविधाएं रहेंगी। बीच-बीच में इमरजेंसी लेन बनाए गए हैं। पूरे रास्ते में 16 एंट्री-एग्जिट पॉइंट हैं।
सिक्योरिटी और निगरानी की लिहाज से जगह-जगह कैमरे लगाए जा रहे हैं। इन कैमरों में अगर कोई एक्सिडेंट ट्रेस होता है तो वहां तक मदद पहुंचने सिर्फ 10 मिनट लगेंगे। एक्सप्रेस-वे पर 100 किलोमीटर/घंटे की रफ्तार से वाहन चलाए जा सकते हैं। इससे ज्यादा स्पीड होने पर चालान कट सकता है। इसके लिए एक्सप्रेस-वे पर हाई-टेक सेंसर लगाए गए हैं।
सहारनपुर क्रॉस करके एक्सप्रेस-वे उत्तराखंड में प्रवेश करता है। यहां से आगे रुड़की और हरिद्वार पड़ता है। हरिद्वार महाकुंभ को ध्यान में रखते हुए सहारनपुर के हल्गोया गांव के पास से हरिद्वार-रुड़की तक करीब 50 किलोमीटर एक्सप्रेस-वे के साथ 6 लेन का अलग रास्ता बनाया गया है। इसका मकसद ये है कि हरिद्वार जाने वालों को एक्सप्रेस-वे के ही सहारे न रहना पड़े। कुंभ के वक्त एक्सप्रेस-वे जाम मुक्त रहे।
उत्तराखंड में प्रवेश करने के लिए डाटकाली मंदिर के पास एक नई सुरंग बनाई गई है। जंगल में सड़क बनाने को लेकर हुआ था विरोध हरिद्वार से देहरादून के बीच की दूरी करीब 50 किलोमीटर है। यहां से देहरादून जाने के लिए लोग एनएच-58 या एनएच-307 का सहारा लेते हैं। यह पहाड़ी रास्ता है, जो रफ्तार कम कर देता था। 50 किलोमीटर का सफर करने में करीब 2 घंटे का समय लग जाता है। लेकिन, अब इसके लिए एक्सप्रेस-वे के रूप में नया विकल्प है। ये रास्ता राजाजी टाइगर रिजर्व और शिवालिक क्षेत्र से होकर गुजरता है। यही वजह है कि इस एक्सप्रेस-वे बनने का विरोध हुआ था।
पर्यावरणप्रेमियों का कहना था- जंगल से सड़क गुजरेगी तो जानवरों का परेशानी होगी। इंसान और जानवरों के बीच संघर्ष बढ़ जाएगा। साथ ही हजारों पेड़ काटने पड़ेंगे। इससे पर्यावरण को नुकसान होगा।
एक्सप्रेसवे राजाजी टाइगर रिजर्व और शिवालिक क्षेत्र से होकर गुजरता है। यही वजह है कि इसके बनने का विरोध हुआ था।
इन्हीं दलीलों के साथ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लगाई गईं। नवंबर, 2021 में कोर्ट ने पेड़ कटाई पर अस्थाई रोक लगा दी और एनजीटी को नए सिरे से जांच करने के निर्देश दिए। जांच के लिए एक्सपर्ट पैनल बनाया गया। पैनल का जिम्मा पर्यावरण मंत्रालय के डीजी फॉरेस्ट दिया गया।
सरकार और एनएचएआई ने पैनल के सामने अपना पक्ष रखा। एनएचएआई ने कहा- एक्सप्रेस-वे बनाने में पेड़ों की कटाई को कम से कम रखने की कोशिश की जाएगी। कॉरिडोर पूरी तरह से वन्यजीवों के अनुकूल बनाया जाएगा। पैन की रिपोर्ट और सरकार का पक्ष सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक्सप्रेस-वे बनाने की परमिशन दे दी थी।
इसकी सबसे खास बात यह है कि शुरुआत के 18 किलोमीटर तक कोई टोल नहीं देना होगा। 212 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे का करीब 135 किलोमीटर (64%) हिस्सा यूपी से होकर गुजरता है। जितना फायदेमंद उत्तराखंड के लिए है, उतना ही यूपी के लिए भी है।
जंगल में पूरा रास्ता एलिवेटेड बनाया गया
राजाजी टाइगर रिजर्व और शिवालिक क्षेत्र में बाघ, शेर, हाथी, हिरण जैसे जानवर पाए जाते हैं। यहां सड़क निकालने का मतलब था, इनके जीवन को डिस्टर्ब करना। इसलिए यहां एक्सप्रेस-वे को एलिवेटेड बनाया गया।
जंगल के बीच 12 किलोमीटर लंबा एलीवेटेड एक्सप्रेस-वे बनाया गया है। एशिया में कहीं भी जंगल में इतनी लंबी एलिवेटेड रोड नहीं बनी है। इसके बनने से जंगली जानवरों को परेशान किए बिना गाड़ियां चलेंगी। इस एलिवेटेड रोड में कई चीजें अनोखी नजर आती हैं। जैसे रात में जानवरों के डायरेक्शन के लिए लाइटिंग लगी है। यहां सफेद नहीं, पीली टाइटिंग का प्रयोग हुआ है।
खास बातें
लागत 12 हजार करोड़
लंबाई : 212 किमी
यूपी में लंबाई 135 किमी (64%)
स्पीड लिमिट 100 किमी/घंटे
113 अंडरपास
5 रेलवे ओवरब्रिज
62 बस शेल्टर
16 एंट्री-एग्जिट पॉइंट
यात्रियों के लिए सुविधाएं
एक्सप्रेसवे तेज रफ्तार के साथ यात्रियों की सुविधा के लिए डिजाइन
वे-साइड सुविधाएं (रेस्ट, फूड, फ्यूल)
सुरक्षित यू-टर्न और क्रॉसिंग
सर्विस रोड लोकल ट्रैफिक के लिए
इंजीनियरिंग का कमाल
7 बड़े इंटरचेंज
14वे-साइड सुविधाएं
19 बड़े अंडरपास
57 छोटे अंडरपास
370 मीटर लंबी टनल
4 मेजर ब्रिज और 44 माइनर ब्रिज
करीब 18.6 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड कॉरिडोर
गणेशपुर-देहरादून सेक्शन सबसे खास हिस्सा
12 किलोमीटर एलिवेटेड रोड
1 टनल
2 बड़े ब्रिज
2 हाथी अंडरपास और 8 एनिमल अंडरपास
डाट काली मंदिर के पास टनल धार्मिक और पर्यावरणीय संतुलन का उदाहरण
कब-क्या हुआ
फरवरी, 2020- में केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट को मंजूरी दी।
सितंबर, 2021-7 सितंबर को ‘सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून’ नाम के एनजीओ ने प्रोजेक्ट की पर्यावरण मंजूरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई।
नवंबर, 2021- सुप्रीम कोर्ट ने एक्सप्रेसवे के गणेशपुर-देहरादून खंड (राजाजी नेशनल पार्क के पास से गुजरता है) में पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई।
दिसंबर, 2021- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मामले की सुनवाई की। एक्सपर्ट पैनल की निगरानी में प्रोजेक्ट शुरू करने की इजाजत दी।
4 दिसंबर – पीएम नरेंद्र मोदी ने दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का शिलान्यास किया।
अप्रैल, 2022- सुप्रीम कोर्ट की तरफ से प्रोजेक्ट को फाइनल क्लियरेंस मिल गई।
अप्रैल, 2026- पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया एक्सप्रेसवे का उद्घाटन ।













