ब्लिट्ज ब्यूरो
वाराणसी। काशी के पीतल और तांबे की कारीगरी के विदेशी भी दीवाने हैं। बीते एक साल में पर्यटकों की चहलकदमी से पीली धातु के कारोबार को रफ्तार मिली है।
पिछले दो महीने में पीतल के कीमत में 200 रुपये प्रति किग्रा की बढ़ोतरी हुई है। 1 नवंबर को इसका भाव 550 रूपये प्रति किग्रा था, जो कि 1 जनवरी 2026 को बढ़कर 750 रुपये तक पहुंच गया। वहीं, तांबा 350 रुपये महंगा हुआ है। 1 नवंबर को इसका भाव 850 रुपये प्रति किग्रा था, जो अब 1200 रूपये प्रति किग्रा तक पहुंच गया है। व्यापारियों का कहना है कि कीमतों में वृद्धि के बावजूद पर्यटकों के उत्साह और मांग में कोई कमी नहीं आई है।
जर्मनी, फ्रांस, जापान, न्यूजीलैंड, रूस से आने वाले पर्यटकों को पूर्वांचल की मिट्टी में बनी पीतल की देवी-देवताओं की मूर्तियां खूब पसंद आई हैं। इसके साथ ही तांबे की लोटिया की भी भारी बिक्री हुई है। पर्यटक इसे दर्शन पूजन के दौरान जल चढ़ाने से लेकर इसमें स्वयं पानी पीने के तौर पर भी इस्तेमाल कर रहे हैं। विदेशी पर्यटक इन्हें न केवल एक स्मृति चिह्न के रूप में, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत के एक हिस्से के रूप में अपने साथ ले जा रहे हैं।
व्यापारी रामजी बताते हैं कि काशी में बिक रही पीतल की मूर्तियां तीन दशक पहले तक मिर्जापुर में बनती थीं लेकिन डिमांड, बिक्री और रोजगार में बढ़ोतरी के कारण अब ठठेरी बाजार, कर्णघंटा, काशीपुरा, लोहटिया में बड़े पैमाने पर इसका निर्माण हो रहा है। इससे करीब 5000 से अधिक कारीगर जुड़े हुए हैं। इन कारीगरों के हाथों को न केवल काम दिया है, बल्कि बनारसी मेटल क्राफ्ट को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है।
इन देशों और राज्यों में होती है सप्लाई
पूर्वांचल में बने पीतल और तांबे के उत्पादों की बिहार, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक में आपूर्ति होती है। इसके अलावा दुबई, कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और सिंगापुर में इसकी जबरदस्त डिमांड है।
पीतल और तांबे से बने सामान
घंटी, दीया स्टैंड/दीपक, आरती के दीप, पूजा थाली, कलश, पंचपात्र, गंगाजल पात्र, धूपदान/अगरबत्ती स्टैंड, देवी-देवताओं की मूर्तियां, नंदी प्रतिमा, त्रिशूल, शेषनाग/नाग प्रतिमा, ओंकार व स्वस्तिक चिह्न, लोटा, थाली, दीवार पर टांगने वाली घंटियां, शोपीस, फूलदान, झूला घंटी (डोर बेल) आदि।































