ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। हिमालय की ऊंची चोटियों और दुर्गम घाटियों में भारत बड़े पैमाने पर निर्माण अभियान चला रहा है। सड़कें, सुरंगें, पुल और हवाई पट्टियां बनाई जा रही हैं। यह सब चीन के साथ सीमा पर संभावित टकराव की तैयारी के तहत हो रहा है। 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत ने अपनी रक्षा रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सैकड़ों मिलियन डॉलर खर्च कर हिमालय में बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रहा है।
2020 के गलवान संघर्ष से सबक
2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इस संघर्ष में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए, जबकि चीन की ओर से भी भारी नुकसान हुआ। यह 45 वर्षों में पहली बार था जब सीमा पर गोलीबारी के बिना हाथापाई हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस घटना ने भारत की कमजोरियों को उजागर किया। चीन ने दशकों से तिब्बत और शिनजियांग में सड़कों, रेलवे और सैन्य ठिकानों का जाल बिछाया था, जिससे वह घंटों में सैनिक और सामग्री भेज सकता था। भारत को दुर्गम इलाके और खराब कनेक्टिविटी के कारण दिनों लग जाते थे।
हिमालय को मजबूत बनाना
भारत का बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) इस अभियान की रीढ़ है। 2025 में बीआरओ का बजट 810 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। हजारों किलोमीटर सड़कें, दर्जनों हेलीपैड और कई हवाई अड्डे बनाए जा रहे हैं।
जोजिला सुरंग
यह सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना है। 11,500 फीट की ऊंचाई पर बन रही यह 14 किलोमीटर लंबी सुरंग 750 मिलियन डॉलर से अधिक की लागत वाली है। 2020 के संघर्ष के बाद निर्माण शुरू हुआ। पूरा होने के बाद यह सुरंग लद्दाख तक सालभर आवाजाही सुनिश्चित करेगी।
न्योमा एयरबेस और हवाई कनेक्टिविटी
भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों में हवाई कनेक्टिविटी भी बड़े पैमाने पर बढ़ाई है। लद्दाख में 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित न्योमा एयरबेस चीन सीमा से मात्र 19 मील दूर है।































