ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। भारतीय रेल की पटरियों की सेहत जांचने वाले पहरेदारों (ट्रैकमैन) के लिए अब ड्यूटी जानलेवा नहीं होगी। सरकार ने पटरियों के रखरखाव के दौरान होने वाले हादसों पर ब्रेक लगाने के लिए मैन्युअल पेट्रोलिंग की जगह आधुनिक डिजिटल और सेंसर-आधारित सिस्टम की अपनाने का निर्णय लिया है।
इसका मुख्य उद्देश्य पटरियों की जांच को सटीक बनाना और ट्रैकमैनों की मृत्यु दर को शून्य पर लाना है। वर्तमान में हर साल 200 से 300
ट्रैकमैनों की ट्रेन से कटकर मौत होती हैं। रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में ट्रेन की चपेट में आकर लगभग 1000 ट्रैकमैनों की मृत्यु हुई है। अक्सर मोड़ पर ट्रेन का अचानक आना, कोहरा या मशीनी शोर के कारण हॉर्न न सुनाई देना इन हादसों की मुख्य वजह है, लेकिन नई तकनीक इन ट्रैकमैनों की जान बचाएगी।
ऐसे करेगा काम
खतरे को कम करने के लिए रेलवे रक्षक नामक वायरलेस कार्मिक चेतावनी प्रणाली को अनिवार्य बना रहा है। यह एक छोटा वायरलेस डिवाइस है जो ट्रैकमैन के पास रहेगा। जैसे ही कोई ट्रेन उस सेक्शन में प्रवेश करेगी, यह डिवाइस दो किलोमीटर पहले ही बीप और वाइब्रेशन के जरिए कर्मचारी को अलर्ट कर देगा, जिससे उन्हें सुरक्षित दूरी बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
सेंसर ट्रॉली से सहूलियत
नई तकनीक न सिर्फ सुरक्षित है बल्कि अधिक कुशल भी है। एक ट्रैकमैन भारी औजारों के साथ दिनभर में 8-10 किलोमीटर पैदल चल पाता है, वहीं अत्याधुनिक सेंसर ट्रॉलियां दिनभर में 40-50 किलोमीटर ट्रैक की जांच कर सकेंगी। इसके अलावा अल्ट्रासोनिक फ्लॉ डिटेक्शन (यूएसएफडी) और ड्रोन्स के जरिए पटरियों की सूक्ष्म दरारों को 99 प्रतिशत सटीकता के साथ पहचाना जा सकेगा।
वर्तमान में रेलवे में लगभग 2.2 लाख से अधिक ट्रैकमैन हैं, जोकि एक लाख 33 हजार किलोमीटर पटरियों की निगरानी करते हैं।
सुरक्षा कवच
सटीक डेटा डिजिटल मॉनिटरिंग का डेटा कंट्रोल रूम व पीएम-गतिशक्ति पोर्टल से जुड़ेगा, जिससे मानवीय लापरवाही की गुंजाइश खत्म होगी।
रियल-टाइम निगरानी
और घाट सेक्शनों का निरीक्षण भी संभव होगा, जहां पहुंचना जानलेवा होता है।
आधुनिक मेंटेनेंस
भारी औजारों की जगह अब लाइटवेट मशीनों और मशीनीकृत मेंटेनेंस को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे ट्रैक की उम्र और मजबूती बढ़ेगी।












