राजेश दुबे
नई दिल्ली। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दे दियाहै। अगर इस्तीफा मंजूर हुआ तो कथित ‘कैश-एट-होम’ विवाद को लेकर संसद में चल रही महाभियोग की प्रक्रिया भी खत्म हो जाएगी। राष्ट्रपति को भेजे पत्र में जस्टिस वर्मा ने लिखा, ‘मैं आपके इस गरिमामय कार्यालय पर उन कारणों का कि अब सरकार चाहे तो शुरू कर सकती है आपराधिक कार्यवाही, बोझ डालना उचित नहीं समझता, जिन्होंने मुझे यह पत्र लिखने के लिए विवश किया है। गहरे दुख के साथ मैं इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश के पद से तत्काल इस्तीफा देता हूं।’ संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, हाई कोर्ट का न्यायाधीश राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इस्तीफा दे सकता है। औपचारिक स्वीकृति की जरूरत नहीं होती। चूंकि अब वे संवैधानिक पद पर नहीं है, इसलिए सरकार चाहे तो उन पर आपराधिक कार्यवाही शुरू कर सकती है।
क्या था पूरा मामला?
14 मार्च 2025 को जस्टिस यशवंत वर्मा (तब दिल्ली हाई कोर्ट जज) के सरकारी आवास के स्टोर में आग लगी। आग बुझाने के दौरान वहां से काफी कैश मिलने का दावा हुआ, जिससे बड़ा विवाद खड़ा हो गया। जांच के लिए सीजेआई संजीव खन्ना ने तीन जजों की इन-हाउस कमिटी बनाई। जांच के दौरान वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया गया। 4 मई की रिपोर्ट में उन्हें पहली नजर में जिम्मेदार माना गया। इस्तीफा न देने पर मामला राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक गया और महाभियोग प्रक्रिया शुरू हुई।
12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए बहुदलीय प्रस्ताव को स्वीकार किया और तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई।
महाभियोग लाने पर पहले भी हुए जजों के इस्तीफे
1993 मे जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था। इसी तरह जस्टिस पीडी दिनाकरण के मामले में पहल हुई थी।
2011 में हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ प्रस्ताव आया था।
2024 दिसंबर में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए सांसदों ने नोटिस दिया था।













