ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में केरल के सबरीमाला मंदिर को लेकर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक भलाई और सुधार के नाम पर किसी भी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। नौ जजों की बेंच ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म से उसकी जरूरी प्रथाओं को छीना नहीं जा सकता। बेंच ने यह भी कहा कि लाखों लोगों की मान्यताओं को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है।
2018 में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति मिली थी
मालूम हो कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली यह बेंच अभी सबरीमाला मामले से जुड़े अहम संवैधानिक सवालों पर दलीलें सुन रही है। खास तौर पर उस सवाल पर, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन बनाने पर बहस हो रही है। साल 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति मिलनी चाहिए। शीर्ष अदालत की पांच जजों की बेंच ने कहा था, पाबंदियों को जरूरी धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता। बेंच ने 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं और लड़कियों के मंदिर में प्रवेश पर रोक लगाने की प्रथा को लगभग छुआछूत जैसा बताया था।
सुनवाई के दौरान, धार्मिक मामलों में जनहित याचिकाओं की स्वीकार्यता से जुड़ी दलीलों का जवाब देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि शायद कोर्ट के सामने सबसे मुश्किल काम यह तय करना है कि लाखों लोगों की मान्यताओं को गलत या भ्रामक कैसे ठहराया जाए। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने सवाल उठाया कि क्या कोर्ट, इसमें शामिल लाखों लोगों का पक्ष सुने बिना, ऐसे सवालों पर कोई फैसला सुना सकता है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भी इसी तरह की चिंता जताते हुए कहा कि ऐसी पीआईएल पर तब तक विचार नहीं किया जाना चाहिए, जब तक याचिकाकर्ता का इसमें कोई सीधा हित न हो और वह सिर्फ एक बाहरी व्यक्ति की तरह काम कर रहा हो। उन्होंने आगे कहा, हम सामाजिक भलाई या सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते।
800 साल पुराने इस मंदिर का प्रबंधन करने वाले त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की ओर से बेंच के सामने पेश होते हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) और अनुच्छेद 26(बी) के बीच के आपसी संबंध को समझाया। उन्होंने दलील दी कि इन दोनों प्रावधानों की व्याख्या संतुलित तरीके से की जानी चाहिए।
अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन खुद करने का अधिकार देता है।













