ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महिला न्यायिक अधिकारियों को बड़ी राहत देते हुए उनको फिर से बहाल करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला न्यायाधीशों को खराब वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) दी गई, जबकि उन्हें कोविड के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। फिर गर्भपात का सामना करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को इस स्थिति के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आप यह गर्व से कहते हैं कि हमारे पास महिला न्यायाधीशों की संख्या बढ़ रही है, तो आपको उनके लिए सुरक्षित और आरामदायक कार्य वातावरण भी उपलब्ध कराना चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लिंग कोई बहाना नहीं है लेकिन स्थिति पर विचार करना जरूरी है। महिला न्यायाधीशों को न्यायालय में महत्वपूर्ण शारीरिक और मानसिक दबावों का सामना करना पड़ता है। केवल लंबित मामलों की संख्या और निपटान दर को एसीआर का एकमात्र मापदंड नहीं माना जा सकता।
क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जनवरी में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जून 2023 तक की गई छह महिला न्यायाधीशों की बर्खास्तगी का स्वत: संज्ञान लिया था। इस मसले में प्रशासनिक समिति और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की फुल बेंच के विचार विमर्श के बाद यह पाया गया कि प्रोबेशन पीरियड के दौरान उनका प्रदर्शन असंतोषजनक था, जिसके बाद विधि विभाग द्वारा बर्खास्तगी के आदेश पारित किए गए।
फरवरी 2024 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से हाईकोर्ट से पूछा था कि क्या वह अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को तैयार है, जिसमें उन्होंने छह में से दो की बर्खास्तगी को बरकरार रखा था। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की फुल बेंच ने शर्मा और चौधरी के खिलाफ बर्खास्तगी के आदेश को रद करने से इनकार कर दिया था और उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी को सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया था।
अदिति कुमार शर्मा और सरिता चौधरी 2018 और 2017 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में शामिल हुई थीं, उनको बहाल नहीं किया गया था। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला रद करते हुए उन्हें राहत दी।

























