ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की नई परिभाषा स्वीकार करने वाले अपने आदेश पर रोक लगा दी है। मामले में अगली सुनवाई 21 जनवरी को होगी।
अदालत ने चिंता जताई कि एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट और कोर्ट की टिप्पणियों को गलत समझा जा रहा है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की अवकाशकालीन पीठ ने इस मुद्दे की व्यापक और समग्र समीक्षा के लिए इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल कर एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा। पीठ ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और सहायक मुद्दों के संबंध में स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई की।
पीठ ने कहा कि इस अदालत का मानना है कि समिति द्वारा प्रस्तुत सिफारिशों के साथ-साथ इस अदालत द्वारा 20 नवंबर, 2025 के फैसले में निर्धारित निष्कर्षों और निर्देशों को स्थगित रखा जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर स्पष्टीकरण की जरूरत होगी। अदालत ने केंद्र सरकार और अन्य को नोटिस जारी कर मामले को आगे की सुनवाई के लिए 21 जनवरी को सूचीबद्ध किया।
कोर्ट ने नए खनन पट्टे पर रोक लगा दी थी
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को 20 नवंबर को स्वीकार कर लिया था तथा विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान एवं गुजरात में फैले इसके क्षेत्रों में नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी थी। अदालत ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की सुरक्षा के लिए अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था।
29 पृष्ठों का फैसला सुनाया था
तिरुमुलपद मामले में लंबे समय से जारी पर्यावरण मुकदमे से उत्पन्न स्वतः संज्ञान मामले में 29 पृष्ठों का फैसला सुनाया था। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस नई परिभाषा का कड़ा विरोध करते हुए आशंका जताई थी कि इससे पहाड़ियों को खनन, रियल एस्टेट और अन्य परियोजनाओं के लिए खोलकर उन्हें नुकसान पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि अरावली क्षेत्र में खनन बढ़ाने की सोच भविष्य के लिए खतरनाक है।
राजस्थान कांग्रेस ने फैसले का स्वागत किया: राजस्थान के पूर्वमुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर के आदेश पर रोक लगाए जाने का स्वागत किया।
केंद्र संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार करने वाले अपने पुराने फैसले पर रोक लगाने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि सरकार इसके संरक्षण और बहाली के लिए प्रतिबद्ध है। यादव ने एक ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वतमाला से संबंधित अपने फैसले पर रोक लगाने और मुद्दों का अध्ययन करने के लिए एक नई समिति के गठन के संबंध में उसके निर्देशों का स्वागत करता हूं।
उत्तर भारत का सुरक्षा कवच है अरावली
अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं हैं, बल्कि उत्तर भारत का सुरक्षा कवच है। यह थार रेगिस्तान के पूर्व की ओर विस्तार को रोकता है। साथ ही दिल्ली, गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों के लिए एक विशाल ‘एक्विफर’ के रूप में काम करता है। यहां 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां और तेंदुए जैसे जंगली जानवर पाए जाते हैं। हालांकि, नई परिभाषा के बाद भी टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क और वाइल्डलाइफ सेंचुरी के रूप में घोषित अरावली के इलाके पूरी तरह सुरक्षित है। वहां किसी भी तरह के खनन या निर्माण की अनुमति नहीं है।
ये थी नई परिभाषा
समिति ने अनुशंसा की थी कि ‘अरावली पहाड़ी’ की परिभाषा अरावली जिलों में स्थित ऐसी किसी भी भू-आकृति के रूप में की जाए, जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक हो। इसके अलावा ‘अरावली पर्वतमाला’ एक-दूसरे से 500 मीटर के अंदर दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों का संग्रह होगा। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को प्रस्ताव में नई परिभाषा पर आदेश जारी किया था।
कब क्या हुआ
20 नवंबर 2025 : सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय की समिति की सिफारिश स्वीकार की।
16 दिसंबर : नए अरावली अभियान से पूर्व सीएम अशोक गहलोत जुड़े।
20 दिसंबर : अरावली बचाने के
लिए उदयपुर में वकीलों ने प्रदर्शन किया।
25 दिसंबर : केंद्र ने अरावली में नए खनन पर रोक लगाई।
27 दिसंबर : अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया।
29 दिसंबर : सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही आदेश पर रोक लगाई।

























