दीपक द्विवेदी
ऐसे आचरण से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र की छवि धूमिल होती है और राजनीतिक संस्कृति का पतन होता है। अतः पक्ष में हों या विपक्ष में, ऐसे पदों की गरिमा बनाए रखना हर नागरिक और नेता की सर्वोच्च जिम्मेदारी है।
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, चुनाव आयोग, न्यायपालिका के न्यायाधीशों से मनमुताबिक फैसला न मिलने पर अथवा अन्य संवैाधनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के प्रति आजकल अपमानजनक टिप्पणियां करने का चलन चिंता का सबब बनता जा रहा है। यही नहीं, संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों का अपमान करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उल्लंघन के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों में घोर गिरावट का भी संकेत है। वस्तुतः ये पद व्यक्तिगत न होकर संस्थागत और राष्ट्रीय गरिमा के प्रतीक होते हैं जिनका निरादर करना सीधे तौर पर लोकतंत्र की नींव, संविधान और जनता के विश्वास को कमजोर करता है। लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन न करना एवं संवैधानिक पदों का सम्मान करना लोकतंत्र की सर्वोच्च परंपराओं का आधार है। ये पद राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, न कि किसी विशेष व्यक्ति का, इसलिए इनका निरादर पूरे राष्ट्र का अपमान है। इसके साथ ही यह संस्थागत गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कृत्य की श्रेणी में भी आता है।
अभी हाल ही में देश में अनेक ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिनमें संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के विरोध के नाम पर उनके खिलाफ तमाम अवसरों पर अत्यधिक अपमानजनक टिप्पणियां की गईं और वक्तव्य दिए गए। कुछ दिन पूर्व ही बिहार चुनाव एवं उसके पहले हुए तमाम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अनेक अपमानजनक बातें कहीं गईं। यही नहीं, विभिन्न राज्यों में हो रहे मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण को लेकर भी देश के वर्तमान चुनाव आयुक्त के प्रति कुछ राज्यों में राजनीतिक दलों के नेताओं ने ऐसी-ऐसी अभद्र टिप्पणियां कीं जिनका यहां उल्लेख भी नहीं किया जा सकता। विरोध के नाम पर देश के अनेक राजनीतिक दलों द्वारा ऐसी बयानबाजी की गई जिसे किसी भी कीमत पर सभ्यता के दायरे में भी नहीं रखा जा सकता। इसका ताजा उदाहरण है पश्चिम बंगाल में आयोजित इंटरनेशनल संथाल कॉन्क्लेव में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे से जुड़ा नया विवाद जो केवल कार्यक्रम में व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। यह मामला अब संवैधानिक गरिमा, प्रशासनिक जवाबदेही और चुनावी राजनीति का मुद्दा बन चुका है। राष्ट्रपति का खुद सार्वजनिक रूप से खामियों की ओर इशारा करना भी सामान्य बात नहीं है।
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब कार्यक्रम स्थल आखिरी समय में बदल दिया गया। स्थानीय प्रशासन का तर्क था कि मूल स्थान भीड़भाड़ वाला था लेकिन राष्ट्रपति ने खुद उस स्थान का दौरा किया और कहा कि जगह पर्याप्त थी। इसके अलावा प्रोटोकॉल के उल्लंघन और दूसरी लापरवाही की बात भी सामने आई है। भारत में राष्ट्रपति का पद राजनीति से सदैव से ही ऊपर माना जाता है। केंद्र और राज्यों में सरकार चाहे किसी की भी हो लेकिन राष्ट्रपति का कार्यक्रम कभी किसी राजनीतिक विवाद में नहीं पड़ता। यह पद किसी व्यक्ति की नहीं, देश की गरिमा और प्रतिष्ठा से जुड़ा है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति खुद यह महसूस करती हैं कि उनके सम्मान का ख्याल नहीं रखा गया तो अनेक सवाल स्वतः ही खड़े हो जाते हैं। राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल को लेकर सख्त नियम हैं जिनका पालन हर हाल में करना ही होता है, यह बात सभी जानते हैं। राष्ट्रपति को आमतौर पर राज्य के मुख्यमंत्री रिसीव करते हैं या उनकी तरफ से नॉमिनेट किया गया उनका कोई मंत्री। कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं हुआ। इस घटना से जुड़ा एक अन्य पहलू भी है और वह है पश्चिम बंगाल राज्य की राजनीति। राज्य में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं और मुख्य टक्कर भारतीय जनता पार्टी और वहां की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के बीच मानी जा रही। चुनावी मैदान का यह संघर्ष अब संवैधानिक परंपराओं में भी नजर आ रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र पर राष्ट्रपति पद के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाया है एवं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कथन है कि कोई प्रोटोकॉल नहीं टूटा। दरअसल यह कार्यक्रम संथाल आदिवासियों से जुड़ा था एवं राष्ट्रपति स्वयं इस समुदाय से संबंध रखती हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि विरोध और प्रदर्शन करना विपक्ष का अधिकार है पर स्वस्थ लोकतंत्र के लिए असहमतियों का सम्मानजनक होना भी आवश्यक है, न कि व्यक्तिगत अपमान करने को अपनी असहमति का हथियार बनाना। यदि इस प्रकार से नैतिक मूल्यों में गिरावट आती जाएगी तो देश के संविधान और लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा और कोई हो नहीं सकता। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र की छवि पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे आचरण से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र की छवि धूमिल होती है और राजनीतिक संस्कृति का पतन होता है। अतः पक्ष में हों या विपक्ष में, ऐसे पदों की गरिमा बनाए रखना हर नागरिक और नेता की सर्वोच्च जिम्मेदारी है।













