ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने आगाह किया है कि सिर्फ अंग्रेजी माध्यम से की गई मेडिकल की पढ़ाई ही भारत में मान्य होगी।
भारत से बड़े पैमाने पर छात्र चीन और रूस और पूर्व सोवियत देशों में मेडिकल की पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। इनमें अधिकतर छात्र उन देशों की स्थानीय भाषा में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। इसको देखते हुए एनएमसी ने यह कदम उठाया है।
रूसी-चीनी भाषा में डॉक्टरी की तो डिग्री बेकार
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने जारी किए मानक
उजबेकिस्तान के चार विश्वविद्यालय ब्लैकलिस्ट
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की ओर से विदेश में भारतीय छात्रों को मेडिकल शिक्षा देने वाले संस्थानों को चिह्नित भी किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, हाल ही में आयोग ने उजबेकिस्तान के चार ऐसे विश्वविद्यालयों को भी ब्लैकलिस्ट किया है।
भारत में अधिक होता है खर्चा
भारत में एमबीबीएस की सीटें 1.29 लाख तक पहुंच गई हैं, लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में मेडिकल की पढ़ाई बेहद महंगी है। पूरे कोर्स में एक करोड़ रुपये से भी ज्यादा का खर्च आता है।
एक चौथाई खर्च पर विदेश में पढ़ाई का अवसर
जानकारी के अनुसार, भारत में भले ही मेडिकल की पढ़ाई अत्यधिक महंगी हो चुकी है, लेकिन चीन, रूस और कई अन्य देशों से अब भी भारत के मुकाबले एक चौथाई कम खर्च में मेडिकल का कोर्स हो जाता है। यानी जो पढ़ाई भारत में एक करोड़ से अधिक रकम खर्च करने के बाद हो रही है, वही पढ़ाई इन देशों में 20 से 25 लाख रुपये खर्च करने होते हैं। यही वजह है कि भारतीय छात्र वहां जाते हैं। इन देशों में कुछ विश्वविद्यालय अंग्रेजी में शिक्षण करते हैं, लेकिन ज्यादातर में अपने देश की भाषा में होती है। ऐसे में भारत से जाने वाले छात्र पहले एक साल स्थानीय भाषा सीखते हैं।
हजारों छात्रों की मुश्किलें बढ़ेंगी
एक अनुमान के अनुसार, पूर्व सोवियत देशों और चीन में करीब 8 से 10 हजार छात्र प्रतिवर्ष मेडिकल की पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। इनमें से 70-80 फीसदी चीनी, रूसी और अन्य स्थानीय भाषाओं में मेडिकल की शिक्षा ले रहे हैं। ऐसे छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
भारत आने के बाद उत्तीर्ण करनी होती है नीट परीक्षा
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के मानकों के अनुसार, विदेशों से मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर लौटने वाले छात्रों को प्रैक्टिस शुरू करने से पहले भारत में नीट पास करना होता है। विदेश से डिग्री पूरी कर भारत आने के बाद भी छात्रों को एक टेस्ट पास करना होता है। नए आदेश के बाद ऐसे छात्र जो गैर अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं, उन्हें इस परीक्षा में शामिल होने की अनुमति भी नहीं मिलेगी। छात्रों को प्रमाणित करना होगा कि जिस कालेज या विश्वविद्यालय से उन्होंने डिग्री ली है, वहां अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होती है।
एनएमसी ने ताजा आदेश में क्या कहा
हाल में जारी एक आदेश में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने कहा कि विदेश से मेडिकल की पढ़ाई के लिए शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी को अनिवार्य किया गया है। आयोग ने अपील की है कि इस मानक को ध्यान में रखते हुए छात्र भविष्य में परेशानी से बचने के लिए उन्हीं कॉलेजों मे एडमिशन लें, जहां अंग्रेजी में पढ़ाई होती है।
खास बातें
पूर्व सोवियत देशों और चीन में भारत से हर साल आठ से 10 हजार छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने जा रहे हैं
विदेश जाने वाले करीब 80 प्रतिशत छात्र उन्हीं देशों की स्थानीय भाषाओं में मेडिकल शिक्षा हासिल कर रहे हैं
विदेशों में पढ़ने के लिए जाने वाले छात्रों को शुरुआती एक साल तक स्थानीय भाषा सीखनी होती है
विदेशों से बिना अंग्रेजी माध्यम के पढ़ाई करने वाले छात्रों को नए आदेश के बाद नीट परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी।













