संदीप रिछारिया
नई दिल्ली।दुनिया इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे, बल्कि अर्थव्यवस्था, तकनीक, ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक वर्चस्व के स्तर पर भी संघर्ष जारी है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की नींव हिला दी है, पश्चिम एशिया में इजरायल और ईरान के तनाव ने पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है, जबकि चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा आने वाले समय के नए शीत युद्ध का संकेत दे रही है। ऐसे समय में भारत का लगातार मजबूत होना केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है।
– रूस ने ऊर्जा संसाधनों के जरिए अपना प्रभाव बनाए रखा, चीन और एशियाई देशों के साथ निकटता बढ़ाई तथा दुनिया में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा को और तेज कर दिया। पुतिन का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि दुनिया अब केवल अमेरिका केंद्रित नहीं रह सकती।
अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप हमेशा “अमेरिका सर्वप्रथम” नीति के समर्थक रहे हैं। चीन के साथ उनका संबंध हमेशा टकराव और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र में रहा। ट्रंप और अमेरिकी रणनीतिकारों को अब यह स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि चीन केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक नियंत्रण की महत्वाकांक्षा रखने वाला राष्ट्र बन चुका है।
– चीन-अमेरिका की बढ़ती प्रतिस्पर्धा नए शीत युद्ध का संकेत दे रही है। ऐसे समय में भारत का लगातार मजबूत होना केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है।
चीन ने पिछले दो दशकों में वैश्विक उत्पादन, दुर्लभ खनिजों, तकनीकी बाजार और एशिया-अफ्रीका-यूरोप में निवेश के माध्यम से अपनी मजबूत पकड़ बनाई, लेकिन इसके साथ ही वह बेरोजगारी, गिरती जनसंख्या, अचल संपत्ति संकट और वैश्विक अविश्वास जैसे गंभीर संकटों से भी घिर गया।
ट्रंप की राजनीति का मूल संदेश यही रहा कि अमेरिका को चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करनी होगी। यही कारण है कि दुनिया अब “चीन के अतिरिक्त दूसरा विकल्प” नीति की ओर बढ़ रही है और भारत इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभर रहा है।
दूसरी ओर व्लादिमीर पुतिन ने रूस-यूक्रेन युद्ध के माध्यम से केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि पश्चिमी देशों को यह संदेश भी दिया कि रूस अब भी वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने की क्षमता रखता है। युद्ध ने रूस को आर्थिक प्रतिबंधों और भारी सैन्य खर्चों के बोझ में अवश्य डाला, लेकिन पुतिन को इससे कुछ महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ भी मिले। रूस ने ऊर्जा संसाधनों के जरिए अपना प्रभाव बनाए रखा, चीन और एशियाई देशों के साथ निकटता बढ़ाई तथा दुनिया में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा को और तेज कर दिया। पुतिन का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि दुनिया अब केवल अमेरिका केंद्रित नहीं रह सकती।
– लगातार आलोचना और राजनीतिक हमलों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी का जनाधार कमजोर होने के बजाय कई क्षेत्रों में और मजबूत होता दिखाई देता है।
इसी बीच किम जोन उन की राजनीति को अक्सर केवल सैन्य आक्रामकता के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। उत्तर कोरिया अच्छी तरह जानता है कि वैश्विक राजनीति में वही राष्ट्र सुरक्षित माना जाता है जिसके पास सैन्य शक्ति, परमाणु क्षमता और आत्मनिर्भरता हो। किम जोंग उन की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं—सत्ता की निरंतरता, सैन्य शक्ति का प्रदर्शन, बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षा और पश्चिमी दबाव का प्रतिरोध। उत्तर कोरिया दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि छोटे राष्ट्र भी यदि सामरिक रूप से मजबूत हों, तो महाशक्तियों को चुनौती दे सकते हैं।
इन वैश्विक संघर्षों के बीच यदि किसी देश ने सबसे संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनाई है तो वह भारत है। जब यूरोप युद्ध में उलझा था, भारत आधारभूत संरचना निर्माण कर रहा था। जब पश्चिमी देश मंदी और ऊर्जा संकट से जूझ रहे थे, भारत डिजिटल क्रांति को गति दे रहा था। आज भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है।
डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष तकनीक, रक्षा निर्माण और वैश्विक निवेश के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को केवल “विकासशील राष्ट्र” नहीं, बल्कि “निर्णायक शक्ति” के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और अरब देश सभी भारत के साथ मजबूत संबंध बनाना चाहते हैं।
भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में लगातार ऐसे नैरेटिव गढ़े गए जिनमें भारत को केवल संकट, असंतोष और असफलता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ। कभी कहा गया कि लोकतंत्र खतरे में है, कभी अर्थव्यवस्था को असफल बताया गया, तो कभी भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ता हुआ दिखाने की कोशिश हुई लेकिन दूसरी ओर जनता ने नए राजमार्ग, आधुनिक रेल व्यवस्था, डिजिटल क्रांति, मजबूत विदेश नीति और वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को भी देखा।
यही कारण है कि लगातार आलोचना और राजनीतिक हमलों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी का जनाधार कमजोर होने के बजाय कई क्षेत्रों में और मजबूत होता दिखाई देता है। राजनीति में अंततः वही विचार टिकता है जो जनता को भविष्य का विश्वास देता है।
विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और कई वैश्विक संस्थाओं ने माना है कि वैश्विक संकटों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत बनी रही। इसके पीछे विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी, डिजिटल क्रांति, आधारभूत संरचना निवेश और संतुलित विदेश नीति जैसे कारण हैं। भारत ने रूस और अमेरिका दोनों के साथ संबंध बनाए रखकर यह दिखाया कि वह किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।
आज दुनिया के बड़े रणनीतिक विशेषज्ञ यह मानने लगे हैं कि आने वाला दशक भारत के लिए निर्णायक हो सकता है। भारत चतुर्पक्षीय समूह का महत्वपूर्ण सदस्य है, ब्रिक्स में प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनकर उभर रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत अपनी सभ्यता, संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ रहा है। पश्चिमी मॉडल जहां उपभोग आधारित विकास पर टिका रहा, वहीं चीन का मॉडल कठोर नियंत्रण पर आधारित रहा। भारत का मॉडल इससे अलग है—यहां विकास के साथ लोकतंत्र भी है, तकनीक के साथ अध्यात्म भी और बाजार के साथ संस्कृति भी।
– भारत सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष तकनीक, रक्षा निर्माण और निवेश में भारत आगे बढ़ रहा है। पीएम मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को केवल विकासशील राष्ट्र नहीं, बल्कि “निर्णायक शक्ति” के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है।
दुनिया आज बारूद के ढेर पर बैठी हुई है। रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-ईरान तनाव, चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा और उत्तर कोरिया की आक्रामक रणनीति यह संकेत देती है कि आने वाला समय और अधिक जटिल हो सकता है लेकिन इसी समय भारत यदि संतुलन, विकास और राष्ट्रीय आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता रहा, तो वह केवल आर्थिक शक्ति ही नहीं, बल्कि इक्क ीसवीं सदी की सबसे प्रभावशाली वैश्विक शक्ति बन सकता है। आज भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि अस्थिर दुनिया के बीच स्थिरता, संभावना और उम्मीद का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।













