ब्लिट्ज ब्यूरो
दीपक द्विवेदी।इस यात्रा पर देश में विपक्ष चाहे जो भी राजनीति करे पर इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी के इस पांच देशों के दौरे ने वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को और मजबूत किया है। इससे इन देशों के साथ न केवल राजनयिक संबंध प्रगाढ़ हुए, बल्कि भारत की आर्थिक और तकनीकी प्रगति को भी नई दिशा मिली है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों (यूएई, इटली, नीदरलैंड, नॉर्वे और स्वीडन) की यात्रा भारत के लिए कूटनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद लाभदायक रही है। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत की आर्थिक वृद्धि, ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करना और उन्नत प्रौद्योगिकी (एआई, सेमीकंडक्टर) व निवेश आकर्षित करना तथा रक्षा और आधुनिक तकनीक में साझेदारी बढ़ाना था जिसके तहत करीब ₹10 लाख करोड़ (करीब 105 अरब डॉलर) से अधिक के संभावित निवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा से भारत में भारी निवेश और रोजगार का रास्ता खुला है जिससे देश में नए उद्योग और लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति की बात करें तो यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा से खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता के बीच भारत की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने के लिए पीएम मोदी की यह यात्रा महत्वपूर्ण रही है। फुजैरा में तेल भंडारण और एलएनजी/एलपीजी सहयोग से भारत को भविष्य के ऊर्जा संकट से सुरक्षा मिलेगी और भविष्य में ऐसे अनिश्चित माहौल के दौरान भारत के हित सुरक्षित रहेंगे। इसी तरह नॉर्वे के साथ ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और समुद्री ऊर्जा (ओशन एनर्जी) पर करार हुआ जो भारत के पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। इससे भारत को सुंयक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को हासिल करने में भी मदद मिलेगी। इस यात्रा के दौरान उच्च-तकनीक और नवाचार के मोर्चे पर भी पीएम मोदी को उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। नीदरलैंड में सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और जल प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारी का रोडमैप तैयार हुआ तो स्वीडन में ‘इन्वेस्ट इन स्वीडन, स्केल इन इंडिया’ के मंत्र पर जोर दिया गया। स्वीडन के साथ जॉइंट इनोवेशन पार्टनरशिप के तहत टेक्नोलॉजी कॉरिडोर बनेगा जिससे एआई और बायोटेक के क्षेत्र में भारत में निवेश बढ़ेगा।
इस यात्रा के दौरान 50 से अधिक ग्लोबल कंपनियों के सीईओ के साथ भी प्रधानमंत्री मोदी की बैठकें हुईं। 4 देशों के समूह (ईएफटीए) से लगभग 105 अरब डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपये) के निवेश का रास्ता साफ हुआ जिससे देश में बुनियादी ढांचा मजबूत होगा और रोजगार के नए अवसर बनेंगे। इसके अलावा इटली के साथ भारत के संबंधों को ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ के स्तर तक पहुंचाया गया है। रक्षा उत्पादन, क्रिटिकल मिनरल्स (दुर्लभ खनिज) और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) को तेज करने पर भी सहमति बनी तथा इन यात्राओं के दौरान इटली से 11वीं सदी की चोल काल की ऐतिहासिक कॉपर प्लेट्स (ताम्रपत्र) को वापस भारत लाने में भी सफलता मिली जो भारतीय इतिहास की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली भारत के लिए महत्वपूर्ण देश हैं और इन देशों की सरकारों ने प्रधानमंत्री मोदी को जो सम्मान दिया है वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन सभी देशों के साथ भारत ने नवीन समझौते किए हैं। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री मोदी का भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लेना भी कम मायने नहीं रखता। यूरोप के ये पांच देश (नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, फिनलैंड और डेनमार्क) नॉर्डिक समूह में गिने जाते हैं। ये यूरोपीय देश भारत के साथ लोकतंत्र, कानून के शासन और बहुपक्षीय नीतियों को साझा करते हैं एवं सुलझे हुए लोकतंत्र माने जाते हैं और भारतीय लोकतंत्र भी किसी से कम नहीं है। फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ओर्पो ने यह उचित ही कहा है कि नॉर्डिक देशों के उद्देश्य भारत के समान हैं तो डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने भी कहा कि तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले देशों का मिलकर काम करना महत्वपूर्ण है। ध्यान रहे कि पिछले एक दशक में नॉर्डिक देशों से भारत में होने वाले निवेश में 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, फिनलैंड और डेनमार्क के अपने समकक्षों के साथ उपयोगी मुलाकात की है। ये ऐसे देश हैं जो अमेरिकी रवैये से बहुत निराशा हैं और स्वतंत्र रूप से दुनिया में खुद को मजबूत करना चाहते हैं। इस कार्य में उन्हें भारत जैसे विशाल देश की मदद की जरूरत पड़ेगी और भारत यह भूमिका बखूबी निभा सकता है। इस यात्रा पर देश में विपक्ष चाहे जितनी भी राजनीति करे पर इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी के इस पांच देशों के दौरे ने वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को और मजबूत किया है। इससे इन देशों के साथ न केवल राजनयिक संबंध प्रगाढ़ हुए, बल्कि भारत की आर्थिक और तकनीकी प्रगति को भी नई दिशा मिली है।












