ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। गंगोत्री ग्लेशियर प्रति वर्ष 28-30 मीटर पीछे हट रहा है। 1950 के बाद ग्लेशियरों के सिकुड़ने की दर तीन-चार मीटर से बढ़कर 30-60 मीटर प्रति दशक हो गई है। यदि ग्लोबल वार्मिंग नहीं रोकी गई तो सदी के अंत तक हिंदूकुश हिमालय के 75-80% ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं। इससे उत्तर भारत समेत एशिया की 50 करोड़ से ज्यादा आबादी पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है।
दुनिया भर में इस समय ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन का असर जमीन पर साफ-साफ दिख रहा है। पर्वतीय क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। दो अरब लोगों को भोजन और पानी देने वाले हिंदूकुश हिमालय से लेकर समुद्र की गहराई तक पृथ्वी गर्म हो रही है। विश्व के सभी पहाड़ पृथ्वी की सतह के लगभग 20% के क्षेत्रफल पर फैले हुए हैं।
ये पहाड़ दुनिया की कुल जनसंख्या के 10% लोगों को घर और 50% लोगों को खेती की जमीन को सिंचाई हेतु जल, औद्योगिक उपयोग और घरेलू उपभोग के लिए मीठा पानी प्रदान करते हैं। पर्वतीय क्षेत्र आनुवांशिक एवं जैव विविधता के भंडार रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्र अन्य आवश्यक संसाधन जैसे लकड़ी, खनिज, जल-विद्युत और मनोरंजक पर्यटन स्थल आदि उपलब्ध कराते है, किन्तु पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन और बढ़ती हुई जनसंख्या, जंगलों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक इस्तेमाल और अवैज्ञानिक कृषि पद्धति के कारण पर्वतीय क्षेत्रों के मौसम को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ रहा है।
ग्लोबलाइजेशन के बाद प्राकृतिक संपदा के दोहन से जो औद्योगिक विकास हुआ है, उससे उत्सर्जित कॉर्बन ने इनके पिघलने की तीव्रता को बढ़ा दिया है। एक शताब्दी पूर्व भी हिमखण्ड पिघलते थे, लेकिन बर्फ गिरने के बाद इनका दायरा निरंतर बढ़ता रहता था। इसलिए गंगा और यमुना जैसी नदियों का प्रवाह सतत बना रहा किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा तीन से चार मीटर प्रति वर्ष घटना शुरू हो गया था।
गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा
हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे घटने की औसत दर 30-60 मीटर प्रति दशक है जो एक चिंता का विषय है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में प्रसिद्ध गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा का मुख्य स्रोत भी है, तेजी से प्रति वर्ष 28-30 मीटर की दर से पीछे को घट रहा है. 1935 से 2022 के बीच यह लगभग 1700 मीटर पीछे हट चुका है। पिछले दो दशकों में पिघलने की दर भी दोगुनी हो गई है। यह हिमालय के ईकोसिस्टम और उत्तर भारत की वाटर सिक्योरिटी के लिए एक गंभीर संकट है। देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। पीछे हट रहे हैं। सिक्किम और लद्दाख (जांस्कर) के ग्लेशियरों पर की गई स्टडी में पाया गया है कि गर्मी के मौसम तापमान में वृद्धि और कम हिमपात इसके मुख्य कारण हैं। हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में बसे देश भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान जहां दुनिया की खासी आबादी रहती है, यहां इन प्रभावों का अधिक जोखिम बना हुआ है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण सदी के अंत तक 75% बर्फ के खत्म होने का खतरा है। भारतीय हिमालय में कुल 9,975 ग्लेशियर हैं। इनमें 900 उत्तराखंड में आते हैं।
ग्लेशियर पिघलेंगे तो नदियों का क्या होगा
इन ग्लेशियरों से ही ज्यादातर नदियां निकलती हैं, जो देश की 40 प्रतिशत आबादी को पीने, सिंचाई व आजीविका के अनेक संसाधन उपलब्ध कराती हैं। ग्लेशियरों के पिघलने और टूटने का यही सिलसिला बना रहा तो देश के पास ऐसा कोई उपाय नहीं है कि वह इन नदियों से जीवन-यापन कर रही 50 करोड़ आबादी को रोजगार व आजीविका के वैकल्पिक संसाधन दे सके?
पड़ोसी देश नेपाल जलवायु परिवर्तन के जोखिम के मामले में दुनिया में चौथा सबसे संवेदनशील देश माना जाता है। नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं, जिसमें तेजी से पिघलते ग्लेशियर, अनियमित मानसून और बाढ़/भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी शामिल है।
हिमालयी ईकोसिस्टम में बदलाव के कारण कृषि उत्पादन कम हो रहा है। पानी के स्रोत सूख रहे हैं। जैव विविधता को नुकसान हो रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा जोखिम में है। नेपाल जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पिछले दो दशकों से अनुकूलन और कम करने के प्रयास भी कर रहा है।













