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फिर चुनावी दंगल

by Blitz India Media
March 26, 2026
in Hindi Edition
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Election Commission of India
दीपक द्विवेदी

एक बात अवश्य है कि इन चुनावों में कुल 824 विधानसभा सीटों के परिणाम से भले ही केंद्र सरकार की स्थिरता पर कोई असर न पड़े पर राष्ट्रीय राजनीति और गठबंधनों पर इनका प्रभाव अवश्य दिखेगा।

भारतीय चुनाव आयोग द्वारा चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा के साथ ही सियासी सरगर्मी एक बार फिर बढ़ गई है। देश में फिलहाल जैसे राजनीतिक हालात हैं, उसमें ये पांचों प्रदेश चुनावी लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें से दो जगह – असम और पुडुचेरी केंद्रशासित प्रदेश में भाजपा सरकार में है जबकि अन्य तीन राज्यों- तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता में नहीं है। खास बात यह है कि असम, केरल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को ही मतदान है और इन राज्यों में अब चुनाव के लिए अधिक समय नहीं बचा है। हालांकि, इन सभी जगहों पर चुनावी बिगुल बीते एक महीने से बज रहा है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार के लिए अधिक समय नहीं मिला। देखा जाए तो एक तरह से यह ठीक भी है क्योंकि चुनाव की घोषणा के साथ ही आचार संहिता प्रभावी हो जाती है और बड़े सरकारी काम ठहर जाते हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव आचार संहिता के समय को कम रखना एक प्रशंसनीय कदम ही कहा जाएगा और राज्यों के काम भी प्रभावित न होंगे।

चुनाव आयोग के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी से कम नहीं है क्योंकि चुनावी राज्यों में एक पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण को लेकर तो चुनाव आयोग के खिलाफ वहां की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने तो मोर्चा ही खोल रखा है। यही नहीं पश्चिम बंगाल में बड़े अफसरों के तबादले को लेकर भी टीएमसी में चुनाव आयोग के प्रति खासी नारजगी है जबकि अन्य चुनावी राज्यों में भी ऐसे ही तबादले किए गए हैं। इस दौरान एक बात और यह देखने को मिली है कि भले ही लोक लुभावन घोषणाओं अथवा चुनावी रेवड़ियां बांटने की निंदा एवं आलोचना देश की सुप्रीम अदालत अथवा अन्य मंचों से की जाती हो; पर सभी राजनीतिक पार्टियां इस तरह की घोषणाएं करने में कतई एक दूसरे से पीछे नहीं हैं।
उदाहरण के तौर पर चुनाव की घोषणा से ठीक पहले, एलपीजी की कमी के मद्देनजर तमिलनाडु की सरकार ने होटलों और क्लाउड किचन के लिए 2 रुपये प्रति यूनिट बिजली सब्सिडी की घोषणा की है। उधर, आचार संहिता लागू होने से कुछ ही घंटे पहले, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी हिंदू और मुस्लिम पुजारियों और मुअज्जिनों के मासिक मानदेय में 500 रुपये की वृद्धि की घोषणा कर डाली। अब उन्हें प्रति माह 2,000 रुपये मिलेंगे। अब इस चुनाव में शायद ही कोई ऐसा दल होगा जिसने सांप्रदायिक समूहों को साधने की कोशिश न की हो। असम और केरल में भी ऐसी ही घोषणाएं की गई हैं। लोगों को लुभाने में कोई दल पीछे नहीं है। राज्य सरकारों के पास धन हो या न हो पर वे अपने हितों के अनुरूप चुनावी रेवड़ियां बांटने में कोई गुरेज नहीं करती हैं।

वैसे गौर से देखा जाए तो राजनीतिक दृष्टि से पश्चिम बंगाल का चुनाव सबसे अहम माना जा रहा है। यहां इस बार केवल दो चरणों में मतदान होगा जबकि पिछली बार यहां आठ चरणों में मतदान हुआ था और आपराधिक तत्वों का बोलबाला रहा था; इसमें कोई संदेह नहीं है। आशा की जा रही है कि इस बार दो चरणों में चुनाव होने से पश्चिम बंगाल में उपद्रवी तत्वों को अधिक मौके नहीं मिल पाएंगे और चुनावी हिंसा पहले की अपेक्षा काफी कम होगी। इसके लिए चुनाव आयोग की निश्चित रूप से सराहना की जानी चाहिए। यह चुनाव वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह चौथे कार्यकाल के लिए लालायित हैं। इस बार राज्य में ममता बनर्जी को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से कड़ी टक्कर मिलने की पूरी संभावना व्यक्त की जा रही है। इसके अलावा असम में लगातार दो बार से बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार है और इस बार भी वहां पर वह कमजोर नहीं दिख रही है। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रमुक बहुत मजबूत है तो केरलम में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा तीसरे कार्यकाल के लिए जोर लगा रहा है। वहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे की राह आसान नहीं दिख रही है। जो भी हो; इन राज्यों में अगली सरकार किस की बनेगी, यह 4 मई को मतगणना के परिणामों से सामने आ जाएगा पर इस बार टक्कर जबरदस्त होगी; इसमें भी कोई संदेह नहीं। चुनाव आयोग को भी अपना काम पूरी मुस्तैदी के साथ करना होगा ताकि किसी को शिकायत का कोई अवसर नहीं मिले। हां; एक बात अवश्य है कि इन चुनावों में कुल 824 विधानसभा सीटों के परिणाम से भले ही केंद्र सरकार की स्थिरता पर कोई असर न पड़े पर राष्ट्रीय राजनीति और गठबंधनों पर इनका प्रभाव अवश्य दिखेगा।

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