दीपक द्विवेदी
नई दिल्ली।पिछले अनुभव तो यही बताते हैं कि यह विपक्षी गठबंधन मतभेदों और मनभेदों वाली पार्टियों का एक ऐसा समूह है जो राज्यों की राजनीति में तो एक-दूसरे के खिलाफ विष वमन करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते किंतु राष्ट्रीय राजनीति में निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए एकजुट होना चाहते हैं।
गत 8 जून को नई दिल्ली में विपक्ष के इंडिया गठबंधन की बैठक (25 दलों के साथ) संपन्न हुई। बैठक में एकजुटता दिखाने और 2029 के चुनाव की रणनीति तैयार करने पर काम करने की कोशिशें हुईं। हालांकि कुछ प्रमुख क्षेत्रीय दलों की अनुपस्थिति और कांग्रेस के साथ आंतरिक मनमुटाव, वास्तविक एकजुटता पर बड़े सवाल भी खड़े कर रहे हैं। इंडिया गठबंधन की इस बैठक में उभरे मतभेदों की वजह से विपक्षी एकजुटता को लेकर अनेक चुनौतियां भी नजर आईं ं जिनसे पार पाना भी जरूरी होगा और इसी पर विपक्ष का भविष्य निर्भर करता है। विपक्षी दलों की यह महत्वपूर्ण बैठक ऐसे समय हुई जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी राजनीतिक ताकत को लगातार सुदृढ़ किया है। इस मंथन में विपक्ष ने पांच सूत्रीय योजना पर सहमति जताई। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, ईवीएम पर सवाल और संसद के मानसून सत्र में एकजुटता दिखाने जैसे मुद्दों पर सभी दलों का एक मंच पर आना यह संदेश देता है कि विपक्ष राजनीतिक रूप से सक्रिय हो कर एकजुटता दिखाने का प्रयास रहा है।
भले ही मंच पर 25 दलों की मौजूदगी ने विपक्षी एकता की तस्वीर पेश की हो लेकिन जमीनी स्तर पर स्थितियां काफी जटिल हैं। आम आदमी पार्टी और डीएमके जैसे प्रमुख घटकों ने बैठक से दूरी बनाई, जो गठबंधन के भीतर समन्वय के अभाव को दर्शाता है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच ‘हमीं से मुहब्बत और हमीं से लड़ाई’ जैसी स्थिति अभी भी बनी हुई है। राज्यों में आपसी मतभेद और नेतृत्व को लेकर असमंजस विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी बन कर सामने आ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि एक मजबूत लोकतंत्र के लिए विपक्ष का एकजुट होना आवश्यक है, लेकिन केवल सरकार का विरोध किसी राजनीतिक विकल्प का आधार नहीं हो सकता। राजनीतिक गलियारों में ही नहीं; जनता कह लें अथवा मतदाता; वह भी यह बात समझता है कि कोई भी विपक्षी गठबंधन केवल नकारात्मक राजनीति के बलबूते आगे नहीं बढ़ सकता। महंगाई, बेरोजगारी और किसानों जैसे जनसरोकारों के समाधान के लिए विपक्ष के पास एक ठोस और स्पष्ट नीतिगत दृष्टि का अभाव दिखाई देता है।
वैसे तो अभी इंडिया गठबंधन की यह बैठक विपक्षी एकता का दिखावा करने में एक हद तक सफल कही जा सकती है किंतु अगली बार अगस्त में हैदराबाद में होने वाली बैठक इस गठबंधन की दिशा तय करेगी कि वास्तव में यह कितना आगे तक जाएगा। पिछले अनुभव तो यही बताते हैं कि यह विपक्षी गठबंधन मतभेदों और मनभेदों वाली पार्टियों का एक ऐसा समूह है जो राज्यों की राजनीति में तो एक-दूसरे के खिलाफ विष वमन करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते किंतु राष्ट्रीय राजनीति में निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए एकजुट होना चाहते हैं। दरअसल एक विश्वसनीय, स्थिर और संगठित विकल्प के रूप में स्थापित होने के लिए विपक्ष को अभी लंबी दूरी तय करनी है। जनता सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर एक मजबूत विजन और जवाबदेह विपक्ष देखना चाहती है। अब देखना यह होगा कि भविष्य का विपक्ष किस हद तक मतभेद भुलाकर एक साझा सिद्धांत पर कितना और कहां तक टिक पाएगा। आईएनडीआईए यानी ‘इंडिया’ गठबंधन अपने आगामी चुनाव प्रदर्शनों में कितना कारगर रहेगा। साथ ही उसकी एकजुटता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वे अपने व्यक्तिगत राजनीतिक स्वार्थों और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पीछे छोड़कर भाजपा के खिलाफ एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम और रणनीति पर कितना काम कर पाते हैं।
सवाल सबसे बड़ा यही है कि क्या वे एक रह पाएंगे? वस्तुतः इन सारे दलों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि ये भीतरी चुनौतियों से ही नहीं निपट पा रहे। विपक्षी गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय हित की भी है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों जैसे टीएमसी, सपा और आप के बीच सीटों के तालमेल और नेतृत्व के टकराव का मुद्दा भी अहम है। विचारधारा का अंतर भी एक बड़ी समस्या है। कुछ राज्यों में विपक्षी दल आपस में ही एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं, जैसे केरल में कांग्रेस और वामपंथी, जिससे सैद्धांतिक एकजुटता में दरारें आ सकती हैं। हालांकि हाल की बैठकों में ममता बनर्जी (टीएमसी) और अखिलेश यादव (सपा) जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों ने आपसी टकराव से बचने और कांग्रेस को राज्यों में नेतृत्व करने की सलाह देकर एकजुटता का सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है किंतु प्रश्न यह भी है कि क्या यह भाजपा को टक्कर दे पाएंगे?













