राजेश दुबे
नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यौन हमलों से जुड़े मामलों में असंवेदनशील न्यायिक टिप्पणियों का पीड़िता, उनके परिवार और बड़े पैमाने पर समाज पर ‘डरावना असर’ पड़ सकता है। इस तरह की टिप्पणियों पर लगाम लगाने के लिए उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों के लिए सुप्रीम कोर्ट दिशा-निर्देश बनाने पर विचार कर सकता है।
दरअसल, शीर्ष अदालत ने इलाहबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ स्वतः संज्ञान याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। फैसले में कहा गया था कि ‘नाबालिग लड़की के स्तनों को पकड़ना, उसकेआ पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसके कपड़े उतारने का प्रयास और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना दुष्कर्म या दुष्कर्म के प्रयास नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों ने कहा कि इस मामले के अलावा, हाल के दिनों में कई हाईकोर्ट ने यौन हमले के मामलों में इसी तरह की मौखिक और लिखित टिप्पणी की है। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पीठ से कहा कि हाल ही में एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि चूंकि रात थी, इसलिए यह आरोपी के लिए एक ‘आमंत्रण’ था। उन्होंने कलकत्ता और राजस्थान हाईकोर्ट के ऐसे दूसरे मामलों का भी पीठ के समक्ष उल्लेख किया। एक अन्य अधिवक्ता ने पीठ से जिला अदालत के एक मामले का जिक्र किया, जहां बंद कमरे में अदालती कार्यवाही के बावजूद कई लोग मौजूद थे और सुनवाई के दौरान पीड़िता को कथित तौर पर परेशान किया गया। ऐसी टिप्पणियों से समाज पर बुरा असर: इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि आप इन सभी मामलों का जिक्र कर सकते हैं तो हम पूरा दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार कर सकते हैं। इस तरह की कोई भी असंवेदनशील बातें और न्यायिक टिप्पणियां पीड़ितों, उनके परिवारों और पूरे समाज पर बुरा असर डाल सकती हैं। पीड़ितों को मजबूर करने के तरीके हैं साथ ही, कभी-कभी, उन्हें (पीड़ितों को) शिकायतें वापस लेने के लिए मजबूर करने के लिए भी ऐसे तरीके अपनाए जाते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘ये हाईकोर्ट की टिप्पणियां हैं और जिला अदालत के स्तर पर इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए और हम दिशा-निर्देश जारी करना चाहेंगे।
































