ब्लिट्ज ब्यूरो
देहरादून। कपकोट के दूरस्थ सुमटी गांव की पहाड़ियों पर दौड़ती एक छोटी-सी बच्ची भारतीय महिला टी-20 टीम में शामिल हो गई हैं। कभी भाइयों के साथ खेतों, आंगन और गली-मोहल्लों में क्रिकेट खेलने वाली प्रेमा रावत अब विश्व कप में भारत की जर्सी पहनकर उतरेंगी।
24 वर्षीय प्रेमा का भारतीय टीम में चयन सिर्फ एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि पहाड़ के उस सपने की कहानी है, जो सीमित संसाधनों के बीच भी बड़ा होने का साहस रखता है। प्रेमा रावत बचपन में घास काटने और खेतों के काम में परिवार का हाथ बंटाती थीं।
भाइयों के साथ खेलते-खेलते सीखा क्रिकेट
प्रेमा ने कक्षा दो तक की पढ़ाई गांव के प्राथमिक विद्यालय में की। बाद में परिवार बरेली चला गया। बचपन में वह अपने भाइयों के साथ क्रिकेट खेलती थीं। घर के आंगन, खेतों और खाली मैदानों में शुरू हुआ खेल धीरे-धीरे उनका जुनून बन गया।
परिवार ने कभी यह नहीं कहा कि क्रिकेट लड़कियों का खेल नहीं है। पिता केदार सिंह रावत, जो एयरफोर्स में कार्यरत हैं और मां बसंती देवी ने हर कदम पर उनका साथ दिया।
डांट भी सुनी, लेकिन नहीं छोड़ा बल्ला
गांव में जब अधिकांश लड़कियां पारंपरिक कामों तक सीमित रहती थीं, तब प्रेमा के हाथों में बल्ला और गेंद हुआ करती थी। कई बार गेंद खेतों में चली जाती, पड़ोसियों की नाराजगी भी झेलनी पड़ती, लेकिन उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। मई-जून की तेज गर्मी में भी बरेली के मैदानों में घंटों अभ्यास करना उनकी दिनचर्या बन गया। छुट्टियों में गांव आने पर भी वह मालूखेत मिनी स्टेडियम में युवाओं के साथ अभ्यास करना नहीं भूलती थीं।
क्रिकेटर भी, घास काटने वाली भी
मां बसंती देवी बताती हैं कि क्रिकेट में नाम कमाने के बाद भी प्रेमा गांव की बेटी ही बनी हुई हैं। उन्हें घास काटना, खेतों की निराई-गुड़ाई करना और मवेशियों की देखभाल करना भी आता है। यही सादगी और जमीन से जुड़ाव उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रेमा ने अपनी अलग पहचान बनाई और एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए राष्ट्रीय टीम तक पहुंचीं।













