• About us
  • Team
  • Privacy Policy
  • Contact
Saturday, June 27, 2026
  • Login
No Result
View All Result
World's first weekly chronicle of development news
  • Blitz Highlights
    • Special
    • Spotlight
    • Insight
    • Entertainment
    • Sports
  • Opinion
  • Legal
  • Perspective
  • Nation
    • East
    • West
    • North
    • South
  • Business & Economy
  • World
  • Hindi Edition
  • International Editions
    • Dubai
    • Tanzania
    • United Kingdom
    • USA
  • Blitz India Business
  • Blitz Highlights
    • Special
    • Spotlight
    • Insight
    • Entertainment
    • Sports
  • Opinion
  • Legal
  • Perspective
  • Nation
    • East
    • West
    • North
    • South
  • Business & Economy
  • World
  • Hindi Edition
  • International Editions
    • Dubai
    • Tanzania
    • United Kingdom
    • USA
  • Blitz India Business
No Result
View All Result
World's first weekly chronicle of development news
No Result
View All Result

नए भारत में होनी ही चाहिए… ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘समाजवाद’ पर नई बहस

हमारी संस्कृति में सर्वधर्म समभाव की बात न कि धर्मनिरपेक्षता की

by Blitz India Media
July 4, 2025
in Hindi Edition
0
There must be a new debate on 'secularism' and 'socialism' in the new India
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 1976 में जोड़े गए दो शब्दों ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर बहस एक बार फिर गरमा चुकी है। इस बार आरएसएस के नेता दत्तात्रेय होसबोले ने संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द जोड़े जाने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि ये शब्द भारतीय संविधान में निर्माण के वक्त से नहीं हैं, इन्हें जोड़ा गया है, इसलिए इसकी जरूरत पर चर्चा की जानी चाहिए।
दत्तात्रेय होसबोले ने इमरजेंसी के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में उक्त बातें कही हैं। वैसे यहां यह बात भी आश्चर्यजनक लगती है कि जिस भारत देश का विभाजन ही धर्म के आधार पर कर दिया गया हो, उस भारत को धर्मनिरपेक्ष कैसे और क्यों कर बना दिया गया जबकि धर्म परायणता तो भारत का मूल आधार है। धर्म यहां हर व्यक्ति के रग-रग में बसा है। चाहे वह किसी भी जाति अथवा संप्रदाय का हो। भगवान बुद्ध की यह भूमि तो आदि काल से ‘धम्मं शरणम् गच्छामि’ यानी कि धर्म की शरण में जाने वाली रही है; तो ऐसे में यहां का कोई भी व्यक्ति बिना धर्म के कैसे रह सकता है। इसीलिए भारत में सर्व धर्म समभाव की संस्कृति रही है और संभवतः इसी कारण से मूल संविधान के निर्माताओं ने किसी भी प्रकार के ‘वाद’ (समाजवाद) या ‘धर्म निरपेक्षता’ जैसे शब्दों को जोड़ने की आवश्यकता ही महसूस नहीं की अथवा भारत को किसी भी प्रकार की विचारधारा के बंधनों से मुक्त रखा ताकि देश निर्बाध गति से विकास के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे और यही किसी देश के लिए श्रेयस्कर भी होता है। सत्य बोलना, दूसरों की मदद करना आदि सत्कर्मी व्यक्ति का धर्म है। अब ऐसे में कोई भी व्यक्ति अपने धर्म के प्रति निरपेक्ष कैसे हो सकता है? यह एक बड़ा सवाल है?
इसके अतिरिक्त किसी भी देश को एक आर्थिक विचारधारा के अधीन नहीं किया जा सकता। इसलिए ‘समाजवाद’ जैसे शब्द की भी आवश्यकता संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं है क्योंकि ये दोनों भावनाएं भारतीय संविधान में पहले से ही समाहित हैं। इसीलिए संविधान निर्माताओं ने ये शब्द भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं रखे थे।

There must be a new debate on 'secularism' and 'socialism' in the new India

होसबोले के बयान का समर्थन करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कहा है कि ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ जैसे शब्द हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं। हमारी संस्कृति में सर्वधर्म समभाव की बात की जाती है न कि धर्मनिरपेक्षता की, इसलिए इनकी जरूरत हमें नहीं है।

उ पराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस मसले पर बयान दिया है कि किसी भी देश के संविधान की प्रस्तावना में बदलाव नहीं किया जाता है, लेकिन इमरजेंसी के दौरान यह किया गया; जो कहीं से भी सही नहीं है।
दरअसल 1975 में जब देश में आपातकाल को लागू किया गया था, उस वक्त देश के संविधान में व्यापक बदलाव संविधान के 42वें संशोधन द्वारा किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि इस संशोधन के जरिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी को बचाने की पूरी व्यवस्था की थी। उस वक्त इंदिरा गांधी की पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आर) के पास 360 सीटें थीं और वह पूर्ण बहुमत में थी। 42वें संशोधन के जरिए ही देश में सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को सीमित करके संसद की सर्वोच्चता को कायम किया गया था और संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवाद’ जैसे शब्द जोड़े गए थे। आरोप तो ये भी है कि इंदिरा गांधी ने हिंदुत्व और दक्षिण पंथ के बढ़ते प्रभाव से निपटने के लिए ही यह सब किया था। ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों पर शुरू हुई राजनीति का हिस्सा बनते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि आरएसएस का असली चेहरा सामने आ गया है। दरअसल आरएसएस और बीजेपी को देश में संविधान नहीं चाहिए, उन्हें देश में मनुस्मृति चाहिए।
क्यों जोड़ा गया 42वें संविधान संशोधन में इन शब्दों को?
1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी की घोषणा की तो उन पर कई तरह के दबाव थे। उनका चुनाव रद कर दिया गया था और नैतिकता की बात करें, तो उन्हें पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं था। देश में 1976 में लोकसभा चुनाव होना था, लेकिन 12 जून 1975 को जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को रद किया और अगले छह साल तक उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया तो अपनी सरकार को बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया और संविधान के 42वें संशोधन द्वारा संविधान में भारी बदलाव किए। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को सीमित किया गया और संसद की सर्वोच्चता को कायम किया गया। साथ ही ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ जैसे शब्द संविधान की प्रस्तावना में डाले गए। इनके जरिए इंदिरा गांधी यह साबित करना चाहती थीं कि वो गरीबों की हितैषी थीं। उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ जैसा नारा दिया था, जिसे उन्होंने समाजवाद से जोड़ा। हालांकि हमारे देश का समाजवाद चीन और रूस के समाजवाद से बिल्कुल भिन्न था।
विधायी मामलों के जानकारों का कहना है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने भविष्य में संशोधन की संभावनाओं को खुला रखा था, तभी संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी जैसे शब्द जोड़े गए। अब तक देश के संविधान में 100 से अधिक संशोधन हो चुके हैं, क्योंकि समय के अनुसार बदलाव जरूरी होता है। लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि संविधान के बारे में जो कुछ बात हो, वो तथ्यों के आधार पर हो, व्यक्तिगत स्वार्थ या विचारों के आधार पर नहीं। इसी वजह से सर्वानुमति और बहुमत जैसे उपाय संविधान में उपलब्ध हैं पर जब ये दोनों शब्द जोड़े गए तब लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दलों के बड़े-बड़े नेता जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चंद्रशेखर और मुलायम सिंह यादव आदि को जेल में डाल दिया गया था और संसद में विपक्ष की गैर मौजूदगी में संशोधनों को पारित करा कर लागू कर दिया गया। अतः यह जरूरी हो जाता है कि ऐसे संशोधनों पर बिना लाग-लपेट के संसद में चर्चा हो और अगर ये शब्द गैर-जरूरी लगें तो जैसे सबकी बिना सहमति के इन्हें जोड़ा गया था; वैसे ही संसद में पक्ष-विपक्ष की मौजूदगी में विचार-विमर्श के बाद इन्हें हटाया भी जा सकता है। यदि 1976 में ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द जोड़े जाना संविधान से छेड़छाड़ नहीं था तो इन शब्दों को हटाया जाना भी संविधान से छेड़छाड़ नहीं माना जा सकता।
केंद्र ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ किया घोषित
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने घोषणा की कि 25 जून को प्रतिवर्ष ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा, ताकि 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान अन्याय के खिलाफ लड़ने वालों को सम्मानित किया जा सके। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए, प्रधानमंत्री ने लिखा; 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाना इस बात की याद दिलाता है कि जब भारत के संविधान को रौंदा गया था, तो क्या हुआ था। यह हर उस व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने का दिन भी है, जिसने आपातकाल की ज्यादतियों के कारण कष्ट झेले थे, जो भारतीय इतिहास का एक काला दौर था।
एक्स पर एक पोस्ट में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह दिन प्रत्येक भारतीय में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और हमारे लोकतंत्र की रक्षा की अमर लौ को जीवित रखने में मदद करेगा। शाह ने कहा, 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी तानाशाही मानसिकता का परिचय देते हुए देश में आपातकाल लगाकर भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का गला घोंट दिया था। लाखों लोगों को बिना किसी कारण के जेल में डाल दिया गया और मीडिया की आवाज दबा दी गई।
नागरिक स्वतंत्रता के दमन का दौर था 1975
1975 के आपातकाल को भारत में राजनीतिक उथल-पुथल और नागरिक स्वतंत्रता के दमन के दौर के रूप में याद किया जाता है। इसमें मौलिक अधिकारों का निलंबन और राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए सख्त सेंसरशिप शामिल थी। हज़ारों विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बिना उचित प्रक्रिया के गिरफ्तार किया गया, जिससे भय और अनिश्चितता का माहौल बना। मीडिया को महत्वपूर्ण प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया। व्यापक जन आक्रोश और सत्तारूढ़ पार्टी की चुनावी हार के बाद 1977 में आपातकाल समाप्त हो गया, जिससे भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं के लचीलेपन का पता चला।
कुल मिला कर अगर कहा जाए तो जो लोग आज सत्तारूढ़ दल पर संविधान को बदल देने की आशंका का आरोप लगा रहे हैं; उन्हीं की पार्टी ने स्वयं शक्तिशाली रहते हुए संविधान की मूल आत्मा के साथ छेड़छाड़ करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी थी। अतः वतर्मान समय को देखते हुए इस मुद्दे पर सार्थक बहस किए जाने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी आाचाहिए क्योंकि विचार-विमर्श सदैव किसी बेहतर विकल्प की ओर ही ले जाते हैं। इस विचार-विमर्श से यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्दों की आवश्यकता आज के नए भारत को है भी या नहीं। यह बहस निश्चित रूप से संसद के भीतर होनी चाहिए जिसमें सभी दलों के विद्वान नेता और संविधानविद् भी मौजूद हों।
‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ जैसे शब्दों पर संविधान सभा में हुई थी चर्चा?

भारतीय संविधान को अंगीकार करने से पहले संविधान सभा में समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष दोनों ही शब्दों पर चर्चा हुई थी, लेकिन इन दोनों शब्दों को मूल संविधान में जगह नहीं दी गई थी।
संविधान सभा में बहस के दौरान डॉ भीमराव अंबेडकर और पंडित नेहरू जैसे नेताओं का यह मत था कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की आत्मा है, जहां धर्म के आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव की कोई संभावना नजर नहीं आती है। अनुच्छेद 25-28 में धार्मिक स्वतंत्रता का जिक्र है इसलिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ को अलग से संविधान में शामिल करने की कोई जरूरत नहीं है। उस वक्त यह माना गया था कि देश का कोई धर्म नहीं होगा और राज्य यानी देश धर्म के आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव नहीं करेगा।

मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए महिलाएं सड़कों पर उतरीं
इमरजेंसी लागू कर जब देश में लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया और लोकतंत्र की आत्मा का गला घोंटा गया, तो पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी घर से बाहर निकलीं और सरकार का विरोध किया। कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी की तो इमरजेंसी के दौरान जेल में यातना सहते हुए मौत हो गई थी। कोई इंदिरा सरकार के खिलाफ बात करता दिखता था, तो उन्हें जेल में डाल दिया जाता था। उन पर अत्याचार होता था, सच लिखने वाले अखबारों पर सेंसरशिप लागू की गई थी। बावजूद इसके जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लोगों ने सच के लिए आवाज बुलंद की और आंदोलन जारी रखा। मूल संविधान के निर्माताओं ने किसी भी प्रकार के ‘वाद’ (समाजवाद) या ‘धर्म निरपेक्षता’ जैसे शब्दों को जोड़ने की आवश्यकता ही महसूस नहीं की अथवा भारत को किसी भी प्रकार की विचारधारा के बंधनों से मुक्त रखा ताकि देश निर्बाध गति से विकास के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे।

– विपक्ष यदि शब्द जोड़े जाना संविधान से छेड़छाड़ नहीं मानता तो हटाना भी संविधान से छेड़छाड़ नहीं
– धम्मं शरणम् गच्छामि’ तो रग-रग में बसा है
– किसी भी प्रकार के वाद में देश को बांधना श्रेयस्कर नहीं

Related Posts

क्या 2029 तक एकजुट रह पाएगा इंडिया गठबंधन?
Hindi Edition

सवालों में घिरी विपक्षी एकता

June 19, 2026
forbes-asia-30-under-30-india-2026
Hindi Edition

फोर्ब्स की ’30 अंडर 30′ लिस्ट में 78 एंट्री के साथ भारत शीर्ष पर

June 19, 2026
cancer
Hindi Edition

पैनक्रियाटिक कैंसर के खिलाफ बड़ी कामयाबी

June 19, 2026
china-tibet-colonial-games-book-review
Hindi Edition

चीन, तिब्बत और सच की लड़ाई

June 19, 2026
export
Hindi Edition

युद्ध संकट के बावजूद यूपी का एक्सपोर्ट पहली बार 2 लाख करोड़ के पार

June 19, 2026
up police
Hindi Edition

दिल्ली में बस की सुरक्षा सशस्त्र महिला पुलिस के हवाले

June 19, 2026
Load More
Next Post
Financial reform mission will strengthen developed India

विकसित भारत को मजबूत करेगा फाइनेंशियल रिफॉर्म मिशन

Recent News

India Launches 100-Day TB Mukt Bharat Campaign 2026
News

Centre to launch Aarogya Setu 2.0

by Blitz India Media
June 27, 2026
0

Blitz Bureau NEW DELHI: Union Health Minister JP Nadda is set to launch a series of digital initiatives for health...

Read moreDetails
Pentagon Pressures Anthropic to Open AI for Military Use

US Govt clears access to Anthropic Mythos 5

June 27, 2026
Goyal highlights India’s manufacturing ecosystem

Goyal highlights India’s manufacturing ecosystem

June 27, 2026
MOdi

PM Modi departs on State Visit to Seychelles

June 27, 2026
Ebola

Ebola cases in DR Congo top 1,200

June 27, 2026

Blitz Highlights

  • Special
  • Spotlight
  • Insight
  • Entertainment
  • Health

International Editions

  • US (New York)
  • UK (London)
  • Middle East (Dubai)
  • Tanzania (Africa)

Nation

  • East
  • West
  • South
  • North
  • Hindi Edition

E-paper

  • India
  • Hindi E-paper
  • Dubai E-Paper
  • USA E-Paper
  • UK-Epaper
  • Tanzania E-paper

Useful Links

  • About us
  • Team
  • Privacy Policy
  • Contact

©2024 Blitz India Media -Building A New Nation

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

    No Result
    View All Result
    • Blitz Highlights
      • Special
      • Spotlight
      • Insight
      • Entertainment
      • Sports
    • Opinion
    • Legal
    • Perspective
    • Nation
      • East
      • West
      • North
      • South
    • Business & Economy
    • World
    • Hindi Edition
    • International Editions
      • Dubai
      • Tanzania
      • United Kingdom
      • USA
    • Blitz India Business

    ©2024 Blitz India Media -Building A New Nation