ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से चला आ रहा ‘द्रविड़ियन द्वंद्व’ (डीएमके बनाम एआईएडीएमके) आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर आ कर खड़ा हो गया है।
सिनेमाई पर्दे से निकलकर राजनीति के कुरुक्षेत्र में उतरे थलपति विजय ने अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (टीवीके) के जरिए वह करिश्मा कर दिखाया है जिसकी कल्पना आधुनिक दौर के राजनैतिक विश्लेषकों के लिए भी कठिन थी।
234 सीटों वाली विधानसभा में 100 सीटों का आंकड़ा पार करना केवल चुनावी जीत नहीं बल्कि एक राजनैतिक सुनामी है। विजय की यह सफलता लगभग 50 साल पहले के उस दौर की याद दिलाती है जब एम.जी. रामचंद्रन ने स्क्रीन से सत्ता तक का सफर तय कर इतिहास रचा था। तमिलनाडु की मिट्टी हमेशा से ‘सिनेमा और सियासत’ के गहरे जुड़ाव की गवाह रही है लेकिन शिवाजी गणेशन की विफलता और हाल के वर्षों में कमल हासन की ‘मक्क ल नीधि मय्यम’ के फीके प्रदर्शन ने यह धारणा बना दी थी कि अब केवल फिल्मी सितारा होना जीत की गारंटी नहीं है लेकिन विजय ने इस धारणा को ध्वस्त कर दिया।
विजय की जीत के तीन प्रमुख स्तंभ रहे जिन्होंने उन्हें चिरंजीवी या पवन कल्याण की शुरुआती विफलताओं से अलग खड़ा कर दिया। उन्होंने गठबंधन की बैसाखियों के बजाय अकेले लड़ने का साहस दिखाया जिससे वे स्वयं को डीएमके और एआईएडीएमके के सशक्त विकल्प के रूप में पेश कर सके। उन्होंने अपनी ‘थलपति’ (कमांडर) वाली छवि को एक ‘रक्षक’ के रूप में तब्दील किया जिससे प्रदेश का वह युवा वोटर उनसे जुड़ा जो पारंपरिक दलों की राजनीति से ऊब चुका था।
विजय ने कमल हासन जैसी ‘बौद्धिक राजनीति’ के बजाय जमीनी स्तर पर मास-अपील और कैडर निर्माण पर ध्यान दिया। जहां विजयकांत (कैप्टन) जैसे सितारे वोट-कटवा या ‘स्पॉइलर’ बनकर रह गए वहीं विजय ने सत्ता के समीकरणों को सीधे चुनौती दी। 100 से अधिक सीटें जीतना यह संकेत है कि तमिलनाडु में ‘तीसरी शक्ति’ का उदय हो चुका है। यह ‘बॉक्स ऑफिस’ वाले जादू का ‘ईवीएम’ पर सीधा असर है। विजय ने साबित कर दिया कि यदि सही समय, सटीक रणनीति और जनता से सीधा जुड़ाव हो तो राजनीति का ‘क्लाइमेक्स’ बदला जा सकता है। तमिलनाडु अब केवल दो दलों की जागीर नहीं रहा बल्कि ‘थलपति’ के नेतृत्व में प्रदेश एक नए राजनैतिक विजन की ओर कदम बढ़ा चुका है।













