ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में झूठे शादी के वादे के आधार पर दर्ज दुष्कर्म मामले को रद कर दिया। अदालत ने कहा कि जब संबंध लंबे समय तक आपसी सहमति से चला हो, तो उसे धोखे या जबरदस्ती का मामला नहीं माना जा सकता।
जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने यह भी कहा कि हर असफल रिश्ता या टूटा वादा आपराधिक मामला नहीं बनता। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को भी रद कर दिया, जिसमें आरोपी की याचिका तकनीकी आधार पर खारिज कर दी गई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहली याचिका मेरिट पर सुनी ही नहीं गई थी, इसलिए दूसरी याचिका को खारिज करना गलत था। महिला की शादी 1998 में हुई थी और वह 2012 से पति से अलग रह रही थी। 2017 में वेबसाइट के जरिए आरोपी से पहचान हुई। महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया। अदालत ने पाया कि कथित घटना के बाद भी दोनों 2017 से 2020 तक लगातार संपर्क में रहे, साथ यात्रा की और होटल में ठहरे। महिला ने 2021 में शिकायत दर्ज कराई, जब संबंध खराब हुए थे।
सहमति वाले रिश्तों को राहत
इस फैसले का असर यह होगा कि झूठे शादी के वादे पर दर्ज रेप मामलों में अदालतें अब संबंध की पूरी पृष्ठभूमि, सहमति, समयावधि और पक्षकारों के आचरण को जानेगी। शादी न होने भर से दुष्कर्म का अपराध नहीं माना नहीं जाएगा। इससे सहमति-आधारित लंबे रिश्तों में आपराधिक मुकदमों पर रोक लग सकती है, लेकिन जहां शुरुआत से धोखा और शोषण साबित होगा, वहां कार्रवाई जारी रहेगी।
कोर्ट ने कहा
हर टूटा वादा आपराधिक मामला नहीं होता
संबंध 2017 से 2020 तक आपसी सहमति से चलता रहा
शिकायत 2021 में, रिश्ते बिगड़ने के बाद दर्ज हुई।
शुरुआत में धोखा देने की मंशा का कोई सबूत नहीं मिला।












