दीपक द्विवेदी
मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और इस विषय में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार्य नहीं हो सकती।
आज भारत के लगभग हर शहर में अनियोजित विकास दिखाई देता है। चाहे योजनाबद्ध कालोनियां हों, शहर-गांव हों या तेजी से बढ़ते बाहरी इलाके। ये सभी शहरों को सस्ता आवास, सेवाएं और रोजगार उपलब्ध कराते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब विकास के साथ सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार नहीं होता। होता भी है तो अनदेखी अथवा भ्रष्ट कर्मियों की साठगांठ से नियमों में अनदेखी की जाती है जो बाद में हादसों के रूप में सामने आती है। देश में सड़कों, होटलों, सिनेमा घरों, विभिन्न संस्थानों के भवनों या अन्य स्थानों पर लंबे समय से ऐसे हादसे हो रहे हैं और निर्दोष लोग उनमें अपनी जान गंवा रहे हैं जिनको रोका जा सकता था किंतु ऐसा हम कर नहीं पा रहे। कहना गलत नहीं होगा कि ये हादसे अक्षम और भ्रष्ट सरकारी तंत्र का नतीजा होते हैं। हादसों के बाद सरकारें मुआवजा देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं और जांच कमेटियों की रिपोर्टें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।
कुछ दिन पूर्व दिल्ली के एक होटल में लगी आग ऐसा ही हादसा था जिसने 22 इंसानी जिंदगी लील लीं थीं और अब लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में हुए अग्निकांड में भी 15 नौजवानों की जान चली गई। दिल्ली के होटल के लिए केवल छह कमरों की मंजूरी ली गई थी और 25 कमरों के साथ संचालित किया जा रहा था। लखनऊ के कोचिंग सेंटर में भी अनियमितताओं की लंबी फेहरिस्त पाई गई है। दिल्ली, लखनऊ और देश के दूसरे हिस्सों में हुए ऐसे हादसों की सूची बहुत लंबी है। सभी घटनाओं में एक साझा विलेन सामने आता है, वह है नियमों का अनुपालन न होना। ऐसे में इस बात की पड़ताल प्रासंगिक हो जाती है कि एक लोक कल्याणकारी लोकतंत्र वाले देश भारत में इंसानों की जिंदगी इतनी सस्ती क्यों है?
इन हादसों के पीछे क्या कारण हैं; इसके बारे में संबंधित विभागों को पहले से ही जानकारी होती है। ऐसे में जिम्मेदार लोगों की पहचान करके उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाना चाहिए; भले ही वे सेवानिवृत्त ही क्यों न हो चुके हों। केवल ऐसी सख्त कार्रवाई से ही हादसे रोके जा सकते हैं।
दरअसल ऐसा लगने लगा है कि देश में हादसों में मौत सिर्फ एक आंकड़ा मात्र बन गई है जबकि पश्चिम के देशों में अपने एक- एक व्यक्ति के जीवन को बचाने के लिए सारी एजेंसियां जमीन-आसमान एक कर देती हैं। वहां मानव जीवन इतना अनमोल है, वहीं दूसरी तरफ हमारे देश में मानवजनित हादसों की बाढ़ है। भारत में हर एक बड़े हादसे के बाद एक तयशुदा पटकथा चलती है। जांच के आदेश दिए जाते हैं। मुआवजे की घोषणा और कुछ अधिकारियों का हादसे वाली जगह से तबादला, बस। स्थिति जस की तस बनी रहती है।
हाल ही में हुई आग की घटनाएं बेहद दुखद हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या यह केवल आग लगने की घटना थी? शायद नहीं। आग तो अक्सर आखिरी घटना होती है, जो हमें नजर आती है लेकिन असली त्रासदी तो बहुत पहले ही शुरू हो जाती है, जब नियमों की अनदेखी होती है, बुनियादी सुविधाओं की कमी को नजरअंदाज किया जाता है और अवैध निर्माण धीरे-धीरे सामान्य बन जाता है। यह सब तभी रुक सकेगा जब देश के किसी भी इलाके में हो रहे मानवजनित हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों को त्वरित कार्रवाई करके कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी। ऐसा होने पर ही लालच में लिप्त और नियम-कानूनों का पालन न कराने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों में भय व्याप्त होगा। ऐसे हादसों के लिए हर विभाग के मौजूदा अथवा सेवानिवृत्त उत्तरदायी कर्मियों को कटघरे में लाना होगा। तभी लोगों की जान को जोखिम में डालने वालों पर लगाम कस सकेगी।
गौर करें तो भारत में प्रशासनिक भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी एक बेहद जटिल और गहरी समस्या है। वर्ष 1995 के डबवाली अग्निकांड ने पूरे विश्व को झकझोर दिया था। उस त्रासदी के बाद अग्नि सुरक्षा संबंधी अनेक नियम, कानून और दिशा-निर्देश बनाए गए। केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि अग्निशमन विभाग में रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए, आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए तथा सभी सार्वजनिक एवं निजी संस्थानों में अग्नि सुरक्षा नियमों की नियमित जांच कर उनके प्रभावी पालन को सुनिश्चित किया जाए। सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे हादसों से देश की साख प्रभावित होती है। एक लोकतंत्र के तौर पर अगर हम परिपक्व हो रहे हैं तो यह बात देश को चलाने वाली संस्थाओं में भी दिखनी चाहिए। देश को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और इस विषय में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार्य नहीं हो सकती।













