दीपक द्विवेदी
गत कुछ माह या वर्षों पर अगर नजर दौड़ाएं तो वैश्विक स्तर पर अनेक देशों के रिश्तों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। खास कर अमेरिका में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद वैश्विक परिदृश्य में ये बदलाव बहुत तेजी से देखने को मिलेगा। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका से गहराते मतभेद के बीच भारत के साथ यूरोप मजबूत दोस्ती की पींगें बढ़ाने को ही आतुर नहीं दिख रहा है बल्कि भारत और यूरोप के आपसी संबंधों को इक्क ीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारियों में से एक बनने की क्षमता वाला भी करार दिया जा रहा है। बीते चंद वर्षों के दौरान वैश्विक स्तर पर सहयोग के समीकरणों में तेजी से बदलाव हो रहा है। उसमें ज्यादातर देशों के लिए यह बात मायने रखती है कि आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर भारत का रुख क्या रहता है। इसकी वजह यह है कि बदलते परिदृश्य में अलग-अलग देश अपने-अपने तरीके से भारत के साथ सहयोग के नए रास्ते खोजने के प्रयास कर रहे हैं।
जब से डोनाल्ड ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बने हैं, तब से ही अनेक मुद्दों पर अमेरिका का रुख किसी से छिपा नहीं है। ट्रंप के अनेक बयानों से वैश्विक स्तर पर जो अनिश्चितता उपजी है उसके बीच यह स्वाभाविक ही है कि दूसरे देश भावी अवरोधों और आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए नए और वैकल्पिक रास्तों की ओर अपने कदम बढ़ाएं। इसका ताजा उदाहरण अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का यूक्रेन के संबंध में अपनाया गया वर्तमान रुख है। हालांकि इसे गलत भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि ट्रंप नहीं चाहते कि अब और आगे भी उनके देश के करदाताओं का धन रूस-यूक्रेन युद्ध में झोंका जाए। रूस-यूक्रेन युद्ध को तीन साल से अधिक हो चुके हैं और अमेरिका अभी तक इस युद्ध में लगातार यूक्रेन के साथ खड़ा दिखाई दिया है। अमेरिका फर्स्ट के सिद्धांत को मानने वाले ट्रंप के बदले रुख के लिहाज से अगर देखें तो यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सला वॉन डेर लेयेन की ताजा भारत यात्रा भी अब कुछ अलग ही महत्व रखती है।
27 देशों के इस शक्तिशाली यूरोपीय संघ के लिए भारत एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक व्यापार और कूटनीति में अस्थिरता देखी जा रही है।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सला वॉन डेर लेयेन विगत दिनों अपनी पूरी टीम के साथ भारत पहुंची थीं जो उनकी चार साल में तीसरी भारत यात्रा रही। डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से जिस तरह तेजी से दुनिया बदली है, ऐसे में यूरोप खुद को अलग-थलग पा रहा है। रूस और चीन मिलकर उसके अस्तित्व के लिए खतरा बन चुके हैं; ऐसे में यूरोप अब भारत की ओर उम्मीदों की निगाह से देख रहा है। ईयू चीफ उर्सला का आना यही बताता है कि भारत अब सिर्फ एक उभरती अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का अहम हिस्सा भी बन चुका है। दिल्ली पहुंचने के बाद उर्सुला ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स (पहले ट्विटर) पर यही पोस्ट किया, “संघर्षों और तीव्र प्रतिस्पर्धा के युग में, आपको विश्वसनीय मित्रों की आवश्यकता है। यूरोप के लिए भारत एक मित्र और रणनीतिक सहयोगी है।” उनका यह पोस्ट साफ दिखाता है कि यूरोप, भारत को एक मजबूत साझेदार के रूप में देखता है।
दरअसल लेयेन की यात्रा ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार को लेकर तनाव बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में यूरोपीय संघ पर निशाना साधते हुए कहा था कि यूरोपीय संघ की स्थापना अमेरिका को परेशान करने के लिए की गई थी। ट्रंप ने ईयू से होने वाले आयात पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाने की चेतावनी दी थी जिसका यूरोपीय संघ ने कड़ा विरोध किया। ऐसे में भारत और ईयू के बीच व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही है। अब चूंकि बदलते परिवेश में भारत एक ग्लोबल पावर का केंद्र बनता जा रहा है, इसलिए भी तमाम देशों को आज एक निश्छल और निष्कपट साथी की जरूरत महसूस हो रही है। भारत एक ऐसा देश है जो तमाम वैश्विक मुद्दों पर तटस्थ एवं स्पष्ट रुख अतीत में प्रदर्शित कर चुका है; इसलिए भी अनेक देश अब भारत के साथ ही अपना उज्ज्वल भविष्य देख रहे हैं। यूरोप के भारत की तरफ झुकाव के पीछे एक बड़ा कारण यूक्रेन युद्ध और रूस से बिगड़ते संबंध भी हैं। भारत ने इस युद्ध में न्यूट्रल स्टैंड लिया जिससे उसे मध्यस्थ की भूमिका में देखा जा रहा है। भारत और रूस के ऐतिहासिक संबंधों के बावजूद यूरोप भारत के साथ मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक संबंध चाहता है। यूरोपीय आयोग अध्यक्ष उर्सला वॉन डेर लेयेन ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच सुरक्षा और रक्षा साझेदारी का प्रस्ताव किया है। यह साझेदारी व्यापार, प्रौद्योगिकी और कनेक्टिविटी क्षेत्रों को विकास देने के लिए की गई है। लेयेन ने भारत-यूरोप संबंधों की अपार संभावनाओं की बात करते हुए कहा कि ये इस सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारियों में से एक हो सकती है। 27 देशों के इस शक्तिशाली यूरोपीय संघ के लिए भारत एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक व्यापार और कूटनीति में अस्थिरता देखी जा रही है।













