बर्लिन। विदेश में जब कोई स्टूडेंट पढ़ने जाता है, तो वह ट्यूशन फीस, रहने-खाने और निजी खर्च के लिए लाखों रुपये खर्च करता है। ये सिलसिला तब तक चलता रहता है, जब तक उसकी पढ़ाई खत्म नहीं हो जाती। यही वजह है कि विदेश पढ़ने गए हर छात्र का ख्वाब होता है कि उसे ग्रेजुएशन के बाद जॉब मिल जाए, ताकि वह पढ़ाई पर हुए खर्च को कवर कर सके। मगर पिछले कुछ वक्त से भारतीय छात्रों के लिए विदेश में पढ़ाई के बाद जॉब पाना मुश्किल बना हुआ है।
हालांकि एक ऐसा देश भी है, जहां अगर कोई भारतीय छात्र पढ़ाई करने जा रहा है, तो उसके पास नौकरी पाने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है। यहां हम जिस देश का जिक्र कर रहे हैं, वह जर्मनी है। इस यूरोपीय देश को लेकर एक नया रिसर्च पेपर जारी हुआ है। इसमें कहा गया है कि जर्मनी की यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने वाले विदेशी छात्रों के पास यहां सीधे रोजगार के लिए आए विदेशी वर्कर्स की तुलना में जॉब पाने की संभावना तीन गुना ज्यादा है। इसका मतलब है कि यहां भारतीयों की भी जॉब की संभावना बढ़ी है।
जर्मनी में कितने भारतीय छात्र पढ़ते हैं?
- जर्मनी में लगभग 60 हजार भारतीय छात्र पढ़ाई कर रहे हैं।
- जर्मनी में कुल भारतीय छात्रों में 41 हजार छात्र और 19 हजार छात्राएं हैं।
- बायोलॉजी समेत इंजीनियरिंग से जुड़े कोर्स की पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या 60% है।
- सोशल साइंसेज, इकोनॉमिक्स और मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स की संख्या 21% है।
- मैथ्स और नैचुरल साइंस के स्टूडेंट्स की संख्या 18% है।
स्किल वर्कर्स की कमी से जूझ रहा जर्मनी?
एक रिसर्च पेपर में बताया गया है कि जर्मनी में जबरदस्त लेबर शॉर्टेज है, यानी ये यूरोपीय देश वर्कर्स की कमी से जूझ रहा है। यहां पर साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स के फील्ड से जुड़े 1.48 लाख लोगों की जरूरत है। अगले एक दशक में जर्मन लेबर मार्केट से 18.50 लाख वर्कर्स बाहर हो जाएंगे, जिससे वर्कर्स की कमी का संकट और भी ज्यादा बढ़ जाएगा।
रिसर्च पेपर से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
- पढ़ाई के बाद ज्यादातर छात्र जर्मनी में रहना चाहते हैं।
- स्टेम क्षेत्र में वर्कर्स की कमी को सिर्फ विदेशी छात्र पूरा कर सकते हैं।
- जर्मनी छात्रों को पढ़ने के लिए बुलाने में अच्छा है, लेकिन उन्हें यहां जॉब के लिए रोकने में औसत है।
- जर्मनी में जॉब पाने के लिए जर्मन भाषा आना बहुत जरूरी है।
- 80% छात्र अंग्रेजी में पढ़ाई करते हैं, लेकिन जर्मन भाषा जरूरी है।
छोटी कंपनियों में जर्मन भाषा वाले वर्कर्स की ज्यादा मांग है।
फील्ड से जुड़ा काम करने पर नौकरी के चांस 84% बढ़ते हैं।
रिसर्च पेपर में क्या कहा गया है?
जर्मनी गैर-अंग्रेजी भाषी देशों में पढ़ाई के लिए दुनिया का सबसे पॉपुलर डेस्टिनेशन बन चुका है। रिसर्चर्स का कहना है कि जर्मनी विदेशी छात्रों के जरिए ही लेबर मार्केट की कमी दूर कर सकता है।













