ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। देश में मानसून तय समय से चार से छह दिन पहले दस्तक दे सकता है। आमतौर पर केरलम में मानसून एक जून तक पहुंचता है, लेकिन इस बार 25 से 27 मई के बीच केरलम पहुंचने की संभावना है। बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में एक सिस्टम बन गया है, जो अगले 48 घंटे में और मजबूत हो सकता है। इससे दक्षिण के कई राज्यों में बारिश बढ़ेगी।
मौसम विभाग के अनुसार, श्रीलंका तट के पास बना कम दबाव का क्षेत्र अब उत्तर दिशा में बढ़ते हुए दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी में पहुंच गया है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रणाली आगे चलकर बंगाल की खाड़ी के मध्य भागों की ओर बढ़ सकती है। इसके साथ ही भूमध्य रेखा के पार से आने वाली नमी वाली हवाएं मजबूत होंगी। दक्षिण-पश्चिमी हवाएं अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के बड़े हिस्से को प्रभावित करेंगी। मौसम के ये संकेत बता रहे हैं कि 16 मई के आसपास दक्षिण-पूर्व बंगाल की खाड़ी, दक्षिण अंडमान सागर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मानसून की शुरुआत हो सकती है।
आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून 20 मई के आसपास दक्षिण अंडमान सागर में प्रवेश करता है। इसके बाद 22 मई तक पोर्ट ब्लेयर और उत्तर अंडमान सागर तक पहुंच जाता है। आमतौर पर इसके बाद मानसून को केरलम पहुंचने में करीब 10 से 12 दिन लगते हैं और इसके आगमन की सामान्य तिथि 1 जून मानी जाती है। लेकिन इस बार तय समय से चार दिन पहले अंडमान सागर पहुंचने की संभावना है, इस आधार पर यह 25-27 मई के बीच केरलम के तट पर पहुंच सकता है। पिछले साल मानसून दक्षिण अंडमान सागर में 13 मई को पहुंच गया था और 24 मई तक केरलम पहुंच गया था। यानी दोनों जगह सामान्य समय से करीब एक सप्ताह पहले मानसून का आगमन हुआ था।
बदल रहा मानसूनी बारिश का समय, खेती से शहरों तक बढ़ी चिंता
भारत में मानसून का स्वभाव तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। कभी बारिश तय समय से देर से पहुंच रही है, तो कहीं कुछ ही घंटों में इतनी अधिक वर्षा हो रही है कि बाढ़ जैसे हालात बन जा रहे हैं। वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, समुद्री तापमान में बदलाव और वैश्विक मौसमी घटनाओं के कारण मानसून का पारंपरिक चक्र अस्थिर होता जा रहा है। इसका असर खेती, जल प्रबंधन, बिजली उत्पादन और शहरों की व्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। भारतीय मौसम विभाग ने अपने ताजा पूर्वानुमान में कहा है कि सप्ताह के अंत तक दक्षिण बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कुछ हिस्सों में दक्षिण-पश्चिम मानसून पहुंच सकता है। हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि लंबे समय में मानसून का समय और उसकी तीव्रता दोनों अधिक अनिश्चित होते जा रहे हैं।
कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ के बन रहे हालात
इवॉल्विंग अर्थ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार भारत में मानसून का समय स्थिर नहीं रहा। कई क्षेत्रों में बारिश देर से शुरू हो रही है, कहीं समय से पहले पहुंच रही है और कई बार शुरुआती बारिश के बाद लंबा सूखा देखने को मिल रहा है। इसके बाद अचानक बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है। पहले मानसून जून की शुरुआत में केरलम पहुंचता है और फिर धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता है। अब यह क्रम टूट रहा है। कुछ राज्यों में लंबे समय तक बादल नहीं बनते, जबकि कुछ में कम समय में सामान्य से कई गुना अधिक बारिश दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल कुल बारिश की मात्रा की नहीं है, बल्कि उसके समय और वितरण की है। मानसून का यही असंतुलन खेती और जल प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन बना प्रमुख कारण
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का बढ़ता तापमान मानसून प्रणाली को सीधे प्रभावित कर रहा है। समुद्र और जमीन के तापमान में बढ़ता अंतर हवाओं की दिशा और नमी के प्रवाह को बदल रहा है। इसका असर मानसूनी बादलों की गति और वर्षा के स्वरूप पर पड़ रहा है। अल नीनो और ला नीना जैसी जलवायु घटनाएं भी मानसून को प्रभावित कर रही हैं। पहले इनके प्रभाव का अनुमान अपेक्षाकृत आसान माना जाता था, लेकिन अब इनके व्यवहार में भी अधिक अस्थिरता देखी जा रही है। कई बार ये प्रणालियां बारिश को कमजोर कर देती हैं, जबकि कुछ स्थितियों में अत्यधिक वर्षा को बढ़ावा देती हैं।













