आस्था भट्टाचार्य
नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना की सामरिक और रणनीतिक एयरलिफ्ट क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए रक्षा खरीद बोर्ड (डीपीबी) ने 60 मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की खरीद को मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब वायुसेना के सोवियत और रूसी मूल के पुराने बेड़े (एंटोनोव एएन-32 और इल्यूशाइन -76) अपनी सेवा आयु (सर्विस एज) के अंतिम चरण में पहुंच रहे हैं। बढ़ती रखरखाव जटिलताओं, स्पेयर पार्ट्स की कमी और बढ़ती लागत के बीच इन एयरक्राफ्ट्स को रिटायर कर नए विमानों को बेड़े में शामिल करना अब रणनीतिक जरूरत बन चुकी है। देश और दुनिया में बदलते हालात के बीच भारत के लिए ट्रांसपोर्ट फ्लीट को अपग्रेड करना आवश्यक हो गया था। रक्षा विभाग ने उसी दिशा में बड़ा कदम उठाया है, ताकि इंडियन एयरफोर्स की रणनीतिक क्षमता बनी रहे। जब 114 राफेल फाइटर जेट को लेकर 3.25 लाख करोड़ की ऐतिहासिक डील को ग्रीन सिग्नल दिया गया है।
डीपीबी की हालिया बैठक में वरिष्ठ नौकरशाहों और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने इस बात पर सहमति जताई कि वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए 60 विमानों का बेड़ा अनिवार्य है। प्रस्ताव के मुताबिक 12 विमान फ्लाई-अवे यानी पूरी तरह से तैयार स्थिति में सीधे खरीदे जाएंगे, जबकि शेष 48 विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा। यह कदम सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और रक्षा निर्माण में स्वदेशीकरण के लक्ष्य के अनुरूप है। बता दें कि एएन-32 पिछले कई दशकों से भारतीय वायुसेना की सामरिक एयरलिफ्ट क्षमता की रीढ़ रहा है। विशेषकर लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे उच्च ऊंचाई और दुर्गम इलाकों में सैनिकों, रसद और उपकरणों की आपूर्ति में इसकी अहम भूमिका रही है। वहीं Il-76 ने हेवी ट्रांसपोर्ट और स्ट्रैटजिक एयरलिफ्ट प्लेटफॉर्म के रूप में काम किया है, जिसने बड़े पैमाने पर सैनिकों की तैनाती, मानवीय सहायता और विशेष अभियानों में योगदान दिया है। हालांकि, इन विमानों की उम्र बढ़ने के साथ उनकी ऑपरेशनल उपलब्धता प्रभावित हो रही है. स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति में कठिनाई और रखरखाव लागत में वृद्धि ने वायुसेना की दीर्घकालिक योजना पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में नया मीडियम ट्रांसपोर्ट प्लेटफॉर्म न केवल निरंतरता सुनिश्चित करेगा, बल्कि आधुनिक तकनीक और बेहतर ईंधन दक्षता के साथ परिचालन क्षमता भी बढ़ाएगा।
कौन-कौन दावेदार?
इस बहुचर्चित सौदे की दौड़ में प्रमुख रूप से तीन अंतरराष्ट्रीय कंपनियां शामिल हैं। ब्राजील की एयरोस्पेस कंपनी एम्ब्रेयर अपने आधुनिक जेट-ऑपरेटेड एम्ब्रेयर सी-390 मिलेनियम के साथ मैदान में है। सी-390 एक ट्विन-इंजन जेट सैन्य परिवहन विमान है, जिसे तेज तैनाती, हाई क्रूज स्पीड और मल्टीरोल ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। यह मिलिट्री ट्रांसपोर्ट, कार्गो मूवमेंट, मेडिकल इवैक्यूएशन और हवाई ईंधन भरने जैसे मिशनों को अंजाम दे सकता है। भारत में इस कार्यक्रम के लिए एएन महिंद्रा के साथ साझेदारी की है। अमेरिकी एयरोस्पेस दिग्गज लाकहीड मार्टिन भी प्रतिस्पर्धा में है। कंपनी ने भारत में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के साथ साझेदारी की है। पहले से ही भारत में एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग साझेदारियों के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी है, जिसमें सी-130जे के पुर्जों का निर्माण भी शामिल है। यूरोपीय कंपनी एयरबस ने अपने चार इंजन वाले टर्बोप्रॉप एयरबस एम एटलस 400एम एटलस की पेशकश की है। ए400एम अपेक्षाकृत बड़ा विमान है, जो अधिक पेलोड और लंबी दूरी तक संचालन की क्षमता रखता है हालांकि, प्रतिस्पर्धा मुख्य रूप से ब्राजील और अमेरिका के प्लेटफॉर्म के बीच केंद्रित मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अधिग्रहण भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों के अनुरूप एक संतुलित मीडियम लिफ्ट क्षमता विकसित करने में मदद करेगा। मौजूदा सी-17 जैसे भारी परिवहन विमानों और सी-130जे जैसे विशेष मिशन प्लेटफॉर्म के बीच की क्षमता को यह नया बेड़ा भरेगा। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से सैनिक तैनाती, आपदा राहत अभियानों में त्वरित सहायता और अंतरराष्ट्रीय मानवीय मिशनों में भारत की भूमिका और सशक्त होगी। साथ ही 48 विमानों का भारत में निर्माण घरेलू रक्षा उद्योग के लिए बड़ा अवसर साबित हो सकता है। इससे न केवल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि भारत को ग्लोबल डिफेंस सप्लाई चेन में मजबूत स्थान भी मिल सकता है। 60 मीडियम ट्रांसपोर्ट विमानों की मंजूरी भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक निर्णायक कदम है, जो आने वाले दशकों में देश की सामरिक तैयारियों को नई मजबूती देगा।













