ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने विगत दिवस एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि कॉलेजियम द्वारा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के चयन की प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आती। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि कॉलेजियम की चयन प्रक्रिया सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत भी नहीं आती और इस पर अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की अवकाशकालीन पीठ ने हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। मल्होत्रा ने आरोप लगाया था कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश के बावजूद उनके नाम पर उचित ढंग से विचार नहीं किया और हाईकोर्ट के जज पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को नजरअंदाज कर दिया।
कॉलेजियम के फैसलों में हम दखल नहीं देंगे
सुनवाई के दौरान पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि हम पैंडोरा बॉक्स नहीं खोलना चाहते। कॉलेजियम के फैसलों में हम दखल नहीं देंगे। अदालत ने कहा कि जजों के चयन की प्रक्रिया पूरी तरह कॉलेजियम के सब्जेक्टिव सैटिस्फेक्शन पर आधारित होती है और इस प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
मल्होत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने दलील दी कि 6 सितंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस द्वारा दो वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों, जिनमें अरविंद मल्होत्रा भी शामिल थे, की उम्मीदवारी पर एकतरफा फैसला लेने को गलत ठहराया था। उस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि चयन का निर्णय कॉलेजियम सामूहिक रूप से करेगा, न कि कोई एक व्यक्ति। इसके बावजूद कॉलेजियम ने उनकी उम्मीदवारी और उनके जवाबों पर विचार नहीं किया।












