गुलशन वर्मा
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने आम नागरिकों के हक में एक बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फुटपाथ पर सुरक्षित चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने अपने इस फैसले में साफ किया है कि फुटपाथ पर पैदल यात्रियों का अधिकार किसी भी मोटर वाहन से ज्यादा होगा।
सुप्रीम कोर्ट के सामने ये मामला तब आया, जब अदालत एक बेहद दुखद सड़क हादसे में मुआवजे के मामले की सुनवाई कर रही थी। इस दर्दनाक हादसे में एक पिता ने अपने महज पांच साल के मासूम बेटे को उस वक्त खो दिया था, जब वो उसे स्कूल लेकर जा रहे थे।
इस मामले में हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि को कम कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने मृतक बच्चे के पिता के लिए मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 11,44,628 रुपये कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस बढ़ी हुई राशि का भुगतान दो महीने के भीतर हर हाल में किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 के तहत एक मौलिक अधिकार है। ये अधिकार संविधान के आर्टिकल 19 (1) (डी) के तहत मिलने वाले ‘देश में कहीं भी आने-जाने के अधिकार’ का एक अहम हिस्सा है।
अदालत ने इसे आर्टिकल 19 (1) (ए), 19(1) (बी), 19(1) (सी) और सबसे अहम आर्टिकल 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के साथ जोड़कर देखा है।
बेंच ने अपने आदेश में लिखा, ‘पैदल चलने के इस बुनियादी अधिकार के दायरे में निर्धारित फुटपाथों का अधिकार भी शामिल है। ये अधिकार प्राथमिक है और इसे सड़कों पर चलने वाले मोटर वाहनों के मुकाबले तरजीह दी जाएगी।’
अधिकारियों की तय होगी जिम्मेदारी
अदालत ने ये भी कहा कि अगर किसी नागरिक को मौलिक अधिकार मिला है, तो उसे पूरा करना प्रशासन का कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘अगर कहीं सड़क मौजूद है, तो ये प्रशासन का कर्तव्य है कि वो वहां पैदल चलने वालों के लिए एक अच्छा और साफ-सुथरा फुटपाथ भी बनाकर दे।’
अदालत के मुताबिक, इस जिम्मेदारी को निभाने वाले ‘ड्यूटी बियरर्स’ में शहरी विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगरपालिकाएं और यहां तक कि ग्राम पंचायतें भी शामिल हैं। इन सभी संस्थाओं को अपने-अपने इलाकों में फुटपाथों का निर्माण करना होगा, उनका रखरखाव करना होगा और उन्हें सुरक्षित रखना होगा।
अगर किसी जगह फुटपाथ नहीं होने या खराब होने के कारण नागरिकों के इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो लोग सीधे कोर्ट जा सकते हैं। नागरिक इन जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी और संवैधानिक उपाय अपनाकर हर्जाना और बहाली की मांग कर सकते हैं। ये कानूनी अधिकार मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाले फायदों से बिल्कुल अलग और स्वतंत्र होगा।













