ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले के बीच दुनिया में तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। इस बीच, अमेरिका ने भारत को 30 दिन तक रूसी तेल खरीदने की छूट दे दी है लेकिन इस कदम के पीछे क्या रणनीति थी, इसके बारे में अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने सफाई दी है।
एक समाचार चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह अस्थायी कदम है, जिसका मकसद ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल के बाजार पर पड़ रहे दबाव को कम करना है।
क्रिस राइट ने एबीसी न्यूज़ से बातचीत में कहा कि यह रूस के प्रति अमेरिकी नीति में कोई बदलाव नहीं है, बल्कि सिर्फ एक अल्पकालिक व्यवस्था और एक ‘व्यावहारिक तरीक़ा’ है।
एक दिन पहले ही अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर जानकारी दी थी कि अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने भारतीय रिफाइनरियों को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की छूट दी है।
भारत ने आधिकारिक तौर पर इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए हैं।
दरअसल, अमेरिका ने इससे पहले रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर दंडात्मक 25 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया था, हालांकि पिछले महीने की शुरुआत में ही इसे सशर्त हटाते हुए और रेसिप्रोकल टैरिफ कम करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि भारत ने कहा है कि वह रूस से तेल नहीं खरीदेगा। ट्रंप ने शर्त के रूप में रूसी तेल खरीद को निगरानी में डाल दिया था।
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री ने एबीसी न्यूज से कहा, हमने भारत में अपने मित्रों से संपर्क किया और कहा, ‘उस तेल को ख़रीदिए और उसे अपनी रिफ़ाइनरियों तक लाइए.’
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, हमें कम समय में बाज़ार में अधिक तेल लाने की ज़रूरत है। हालांकि लंबी अवधि की आपूर्ति पर्याप्त है और इसकी कोई चिंता नहीं है लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में हालात के चलते तेल के दाम में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है।
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री ने कहा, हम एक अल्पकालिक कदम उठा रहे हैं। रूसी तेल दक्षिण एशिया के आस-पास समंदर में पहले से ही जहाजों में लदा हुआ मौजूद है। चीन चूंकि अपने आपूर्तिकर्ताओं से बहुत अच्छा व्यवहार नहीं कर रहा है। इसलिए वहां भारी मात्रा में तेल मौजूद है और इसीलिए हमने अपने दोस्त भारत से संपर्क किया और कहा कि उस तेल को खरीदें और अपनी रिफ़ाइनरियों तक ले आएं।
क्रिस राइट ने कहा, इससे तत्काल भारतीय रिफाइनरियों में तेल की आपूर्ति होगी और बाकी दुनिया की अन्य रिफ़ाइनरियों पर दबाव कम होगा जिनकी होड़ बाज़ार में भारत के साथ नहीं है।













