ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले शराब नीति पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट सामने आई है। इसमें दावा किया गया है कि दिल्ली में खत्म की जा चुकी शराब नीति से सरकारी खजाने को 2,026 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन मंत्री और आम आदमी पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले मनीष सिसोदिया के नेतृत्व वाले मंत्रियों के समूह (जीओएम) ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों की अनदेखी की, जिसकी वजह से सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगा। लाइसेंस जारी करने में नियमों का उल्लंघन किया गया। नियमों की अनदेखी करने वालों को दंडित नहीं किया गया। मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता नहीं रखी गई और कई प्रमुख फैसलों पर कैबिनेट या उपराज्यपाल की मंजूरी नहीं ली गई।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ खुदरा विक्रेताओं ने नीति की अवधि समाप्त होने से पहले ही लाइसेंस सरेंडर कर दिए और सरकार ने इनका दोबारा टेंडर नहीं किया, इससे 890 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इसके अलावा जोनल लाइसेंसधारियों को दी गई छूट से 941 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। कोरोना पाबंदियों के आधार पर जोनल लाइसेंसधारकों को 144 करोड़ रुपये की लाइसेंस शुल्क छूट दी गई, जिसके कारण राजस्व का नुकसान हुआ। इसके अलावा, सुरक्षा जमा राशि के गलत तरीके से वसूली के कारण 27 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता की कमी
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत निर्मित विदेशी शराब के मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता नहीं रखी गई। शराब निर्माता और थोक विक्रेता (एल-1 लाइसेंसधारी) को ही शराब की कीमतें तय करने की जिम्मेदारी दे गई, जिससे उन्होंने अपने लाभ के लिए मूल्यों में हेर-फेर किया। अधिकतम राजस्व संग्रह के लिए शराब की कीमत सबसे महत्वपूर्ण होती है।
आप नेताओं को रिश्वत से लाभ
कैग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि शराब नीति को लागू करने में चूक हुई, जिसके चलते उसके उद्देश्यों को हासिल नहीं किया जा सका और इससे भारी राजस्व की हानि हुई। वहीं, आप नेताओं को रिश्वत से फायदा हुआ। शिकायतों के बावजूद सभी इकाइयों को बोली लगाने की अनुमति दी गई और बिना पूरी जांच के लाइसेंस जारी किए गए। इसके लिए जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने को कहा गया है।













