ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। पढ़ने लिखने की आदत से भूलने की बीमारी का खतरा 40 फीसदी तक कम रहता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अकसर बुढ़ापे में याददाश्त खोने और मानसिक कमजोरी (डिमेंशिया) के बढ़ते खतरे देखे गए हैं लेकिन हालिया शोध से पता चलता है कि जीवनभर पढ़ने, लिखने और नई भाषाएं सीखने जैसी बौद्धिक गतिविधियों में सक्रिय रहने वाले लोगों में डिमेंशिया का खतरा कम हो सकता है। यह शोध बताता है कि हम अपने दिमाग को जितना व्यस्त रखेंगे, अल्जाइमर जैसी बीमारियों को उतना ही पीछे धकेल पाएंगे।
शिकागो की रश यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर की शोधकर्ता एंड्रिया जमिट के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में पाया गया कि मानसिक स्वास्थ्य केवल बुढ़ापे की आदतों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह जीवनभर के बौद्धिक परिवेश से प्रभावित होता है।

























