ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। तेजाब हमलों और गंभीर जलने की पीड़ा झेल चुके चेहरों पर जख्मों के निशान अब हमेशा के लिए नहीं रहेंगे। जख्म के पीछे छिपी मुस्कान लौटाने की दिशा में एम्स दिल्ली फेस ट्रांसप्लांट जैसा ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। अगले एक साल में एम्स के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव एंड बर्न सर्जरी विभाग ने फेस ट्रांसप्लांट की योजना बनाई है। इसे लेकर कैडेवर (मृत मानव शरीर) पर चेहरे संबंधी प्रक्रिया को निकालने का कार्य सफलतापूर्वक कर लिया गया है।
एम्स में कार्यशाला का आयोजन भी किया गया । कार्यशाला में स्वास्थ्यकर्मियों का नेतृत्व ब्रिषम एंड विमेंस हॉस्पिटल (हार्वर्ड मेडिकल स्कूल) में प्लास्टिक सर्जरी के एसोसिएट चीफ डॉ. इंद्रनील सिन्हा ने किया। अमेरिका में हुए 30 फेस ट्रांसप्लाट में से दस उनकी टीम ने किए है। वैश्विक तौर पर अभी तक 80 फेस ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं। डॉ. इंद्रनील सिन्हा ने कहा कि ट्रांसप्लांट के लिए चेहरे के रंग का मिलान होना, जेंडर का सामान और उम्र एक जैसी होना बहुत जरूरी है। ट्रांसप्लांट के बाद रिजेक्शन की संभावना अधिक रहती है। इससे बचने के लिए दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। ट्रांसप्लांट के बाद चेहरे में बदलाव जरूर होता है।
ट्रांसप्लांट के लिए चेहरे से यह निकालते हैं
एम्स के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव एंड बर्न सर्जरी विभाग प्रमुख डॉ. मनीष सिंघल ने बताया कि फेस ट्रांसप्लाट के लिए कैडेवर से चेहरे की त्वचा, नाक, ब्लड वेसल्स, मांसपेशियों को सफलतापूर्वक निकाल लिया गया। ट्रांसप्लांट के लिए करीब 40-50 स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण का कार्य पूरा हो चुका है। अगले एक साल में फेस ट्रांसप्लांट का लक्ष्य रखा गया है। लाइसेंस संबंधी तकनीकी प्रक्रिया को पूरा किया जाना है।













