दीपक द्विवेदी एडीटर-इन-चीफ
यह राष्ट्रहित का निर्णय होता पर ऐसा लगता है कि दलगत राजनीति के फेर में महिला सशक्तिकरण का एक अवसर राष्ट्र ने गंवा दिया है।
लोकसभा में 17 अप्रैल को संविधान में 131वां संशोधन बिल वोटिंग के बाद गिर गया। यह बिल महिला आरक्षण क़ानून अथवा नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के लिए लाया गया था। एनडीए बिल के पक्ष में दो तिहाई वोट हासिल करने में नाकाम रहा। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े जबकि इसके विरोध में 230 वोट पड़े। इसके बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि बाकी दोनों संशोधन बिलों को आगे नहीं बढ़ाने का फ़ैसला किया गया है। अगर यह बिल पास हो जाता तो 2029 के चुनाव में संसद में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण प्राप्त हो जाता। सरकार ने इस बिल को पारित कराने के लिए 16 अप्रैल से तीन दिन का संसद का विशेष सत्र बुलाया था। इस दौरान महिला आरक्षण विधेयक पर गरमा-गरम चर्चा और राजनीति अपने चरम पर रही। अगर यह बिल पास होता तो देश के लिए यह एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक बदलाव होता। संसद के इस विशेष सत्र और महिला आरक्षण बिल में संशोधन के लिए सर्वसम्मति बनाने के सरकार ने हर संभव प्रयास किए थे। इस प्रस्तावित संशोधन के माध्यम से यह विधायी निकायों में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण प्रदान करता।
इस बड़े बदलाव के लिए तीन कानूनों में संशोधन की जरूरत थी। केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन के संख्या बल पर अगर नजर दौड़ाएं तो बदलाव तय सा लग रहा था किंतु ऐसा हो न सका। राजनीतिक दलों के अपने हितों की राजनीति महिलाओं के सशक्तिकरण की एक बड़ी पहल पर हावी हो गई सी साफ नजर आई। महिलाओं के सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें बनाने वाले दल इस मुद्दे पर एक मत नहीं हो पाए। इसके पहले भी महिला आरक्षण बिल को पास होने में 30 साल से अधिक लग गए और सिर्फ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार 2023 में इसे संसद में पारित कराने में कामयाब हो सकी। पहले पारित हुए कानून के अनुसार, 33 प्रतिशत महिला आरक्षण अगली जनगणना के बाद था मिलना था लेकिन अब नई जनगणना वाली बाध्यता समाप्त की जानी थी जिसके लिए यह विशेष सत्र बुलाया गया था। लक्ष्य था कि अगले लोकसभा चुनाव 2029 में महिला आरक्षण लागू हो सके। देखा जाए तो यह भारतीय राजनीति में एक बहुत बड़ा परिवर्तन लाता और इससे भारतीय राजनीति का चरित्र और स्वरूप भी बदल जाता। यदि देखा जाए तो उत्तर भारत में विपक्ष के पास जो दलीले हैं, वास्तव में, उनमें कोई खास दम नजर नहीं आ रहा है और केंद्र सरकार की ओर से भी निरंतर यही कहा गया कि किसी भी राज्य के साथ कोई अन्याय नहीं होगा।
वैसे विपक्ष ने बार-बार जो यह चिंता जताई कि दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय होने जा रहा है; इस पर भविष्य में भी अवश्य गंभीरता से परीक्षण करने में कोई बुराई नहीं है ताकि किसी भी पक्ष को कोई शिकायत न रहे। वैसे संभावना यही है कि जब भी यह लागू होगा तो लोकसभा की सीटों में आनुपातिक वृद्धि की जाएगी। इसका तात्पर्य यही हुआ कि राज्यों की वर्तमान सीटों की संख्या में दोगुने तक का इजाफा हो सकता है और प्रथम दृष्टया विपक्ष का अन्याय वाला बयान बहुत अधिक दमदार नहीं है। अभी तमिलनाडु में 30 सीटें हैं, जो बढ़कर 78 हो जाती। अगर ऐसा होता, तो दक्षिण के राज्यों को किसी तरह की शिकायत नहीं होती। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का यह सुझाव है कि सीटों में आधी वृद्धि आनुपातिक तौर पर हो और बाकी आधी वृद्धि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद को देखते हुए की जाए। यदि ऐसा होता तो तेजी से तरक्क ी कर रहे राज्यों को भी लाभ होता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वे उत्तर के भारी आबादी वाले राज्यों से पीछे नहीं रहते।
खैर अब स्थिति यह है कि विपक्ष को यह बात समझ नहीं आई। इस बार विपक्ष विरोध की राजनीति करने में काफी सक्रिय रहा। ऐसा लग रहा है कि श्रेय की राजनीति के कारण अच्छे काम भी विलंब से हो पाते हैं जबकि भारत की पहली महिला राष्ट्रपति रह चुकीं प्रतिभा पाटिल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इसे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया था। प्राधनमंत्री मोदी ने भी कहा था कि महिला आरक्षण पर आज का अवसर, एक साथ बैठकर, एक दिशा में सोचकर विकसित भारत बनाने में नारी शक्ति की भागीदारी को स्वीकार करने का अवसर है। इसे राजनीति के तराजू से मत तौलिए। यह राष्ट्रहित का निर्णय होता पर ऐसा लगता है कि दलगत राजनीति के फेर में महिला सशक्तिकरण का एक अवसर राष्ट्र ने गंवा दिया है।













