दीपक द्विवेदी
नई दिल्ली।पीएम मोदी ने दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों की बात कर संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की पहल कर दी है। अब देखना यह है कि नई सरकार किस तरह अपने संबंधों को फिर से भारत के साथ पटरी पर लाती है।
ग्लादेश में करीब 19 महीने के राजनीतिक उथल-पुथल के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के गठबंधन वाली सरकार ने शपथ तो ले ली है लेकिन उसके सामने चुनौतियों का पहाड़ भी खड़ा है। शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग की गैर-मौजूदगी में हुए देश के 13वें संसदीय चुनाव में बीएनपी को दो-तिहाई से ज्यादा बहुमत मिला है। खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान करीब 17 साल तक लंदन में निर्वासन में रहने के बाद बीते 25 दिसंबर को ढाका लौटे थे। उन्होंने जिया के निधन के बाद अपनी पार्टी को संगठित कर बहुत कम समय में उसे चुनावी कामयाबी तो दिला दी है लेकिन उनकी असली परीक्षा अब शुरू हो रही है। खबरों के मुताबिक नई सरकार पर 23 लाख करोड़ टका से भी ज्यादा कर्ज का बोझ है और देश में मुद्रास्फीति आसमान छू रही है तथा अर्थव्यवस्था पर संकट गहरा रहा है। आर्थिक मोर्चे पर संघर्ष के अलावा तारिक रहमान के सामने कानून-व्यवस्था के साथ ही पड़ोसी देशों से संबंधों में सुधार की भी बड़ी चुनौती है। कभी उनकी सहयोगी रही जमात-ए-इस्लामी के मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरना सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। राजनीतिक और सामाजिक हलकों में जमात अपने कट्टरपंथी रवैये के लिए बदनाम रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी तात्कालिक चुनौती कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधारना और आर्थिक संकट पर काबू पाने के साथ-साथ देश के लोगों के बीएनपी पर जताए गए भरोसे पर खरा उतरना भी है। अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस के करीब डेढ़ साल के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति भी अत्यंत निचले स्तर तक पहुंच चुकी है। सरकार के सामने देश में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के साथ ही युवाओं की उम्मीदों पर खरा उतरने, बढ़ती बेरोजगारी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के साथ ही प्रशासनिक सुधारों को लागू करने और पड़ोसी देशों के साथ शीघ्र ही संबंधों में संतुलन कायम करना भी जरूरी है। देश में बेरोजगारी की दर 13.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है। करीब चार करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं। बीएनपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में महिलाओं को भत्ता और गरीब परिवारों को फैमिली कार्ड देने जैसे कई लोकप्रिय वादे किए थे। सरकार के सामने इन योजनाओं के लिए धन जुटाने की भी चुनौती है। बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान ने भी चुनावी नतीजों के बाद ढाका में अपनी प्रेस कांफ्रेंस में माना था कि सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने, आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और सुशासन बहाल करने की गंभीर चुनौतियां हैं।
इसके अतिरिक्त अवामी लीग के प्रति सरकार के रवैये पर भी विश्लेषकों की नजरें टिकी हैं। हालांकि तारिक रहमान यह कह चुके हैं कि शेख हसीना की संतान को भी स्वदेश लौट कर राजनीति में शामिल होने का अधिकार है। इससे अवामी लीग की उम्मीद बढ़ी है और विभिन्न शहरों में उसके दफ्तर खुलने लगे हैं। ज्ञात हो कि अवामी लीग की नेता शेख हसीना अपने खिलाफ हुए विद्रोह के बाद से भारत में शरण लिए हुए हैं पर विश्लेषकों का कहना है कि अवामी लीग पर लगी पाबंदी हटाने और शेख हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर बीएनपी को चौतरफा दबावों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार को रोहिंग्या मुद्दे सहित जटिल विदेश नीति के विभिन्न पहलुओं को साधने के साथ ही अमेरिका और चीन के बीच टकराव के प्रभाव से खुद को मुक्त करने तथा भारत, चीन और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में संतुलन कायम रखने की भी बड़ी चुनौती है। वैसे तारिक रहमान ने ज्यादा संतुलित रवैया अपनाया है। उन्होंने भारत विरोधी भावनाओं को भड़काया नहीं बल्कि सभी को साथ लेकर चलने की बात कही है। भारत ने भी समय-समय पर बताया है कि वह बदले नेतृत्व के साथ रिश्ते बढ़ाने के लिए तैयार है। बीएनपी की जीत पर तारिक को बधाई देने वाले सबसे पहले वैश्विक नेताओं में पीएम नरेंद्र मोदी रहे। पीएम मोदी ने दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों की बात कर संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की पहल कर दी है। अब देखना यह है कि नई सरकार किस तरह अपने संबंधों को फिर से भारत के साथ पटरी पर लाती है। बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमीगर ने भी पत्रकारों से बातचीत में विश्वास जताया है कि सरकार तमाम चुनौतियों का राजनीतिक और आर्थिक नजरिए से मुकाबला करेगी। उनकी उम्मीद है कि अपने अतीत के अनुभव से पार्टी इन चुनौतियों से निपटने में कामयाब रहेगी।
























